कवर स्टोरी - 07 October, 2019

सामाजिक सरोकारों से जुड़ी राज काज की नई शैली

राजनीति करनी है तो जरूरी हो जाता है कि समाज की स्थापित परंपराओं, मूल्यों, संस्कारों इत्यादि की परवाह की जाए और परवाह ही नहीं बल्कि सरकार उसको प्रश्रय ,मजबूती दी जाए। आमतौर पर सत्ता में आने के बाद सामाजिक सरोकारों से पीठ दिखाने की परिपाटी रही है। मंदिरों की चौखट पर ढोक लगाने के ढोंग से सभी परिचित हैं यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में दस्तूर जैसा है।

डा. राहुल रंजन
राजनीति करनी है तो जरूरी हो जाता है कि समाज की स्थापित परंपराओं, मूल्यों, संस्कारों इत्यादि की परवाह की जाए और परवाह ही नहीं बल्कि सरकार उसको प्रश्रय ,मजबूती दी जाए। आमतौर पर सत्ता में आने के बाद सामाजिक सरोकारों से पीठ दिखाने की परिपाटी रही है। मंदिरों की चौखट पर ढोक लगाने के ढोंग से सभी परिचित हैं यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में दस्तूर जैसा है। नेता ऐसे न जाने कितने उपक्रम करते हैं जिससे कि यह प्रतीत हो कि वही एक ऐसे हैं जो धार्मिक हैं। हाथों में इतने कलावे बंधे रहते हैं कि जैसे मंदिर की रेलिंग हो जिस पर मन्नतों के लाल पीले धागे दिखाई देते हैं। हालांकि अब कलावा बांधना धर्म से वास्ता कम रखता है कुछ फैशन है और बहुत कुछ दिखावा। हमने उन सरोकारों से वास्ता रखना छोड़ दिया जिससे देश खड़ा हो सकता है। हम गांधी की लाठी और चश्मे का तो भरपूर दोहन करते रहे लेकिन न लाठी का रुख सुधार की ओर हो सका और न ही चश्मे से भविष्य का भारत देख पाए। हम अपने अंदर बसे रावण को जला नहीं पाए तो बाहर पुतले को जलाकर तालियां बजाने में ही लगे रहे। हम मूर्तियों के कद को लेकर जूझने में वक्त जाया कर रहे हैं लेकिन हमे पर्यावरण की चिंता नहीं है और न ही जल प्रदूषण की फिक्र। हम सिर्फ और सिर्फ अपनी आस्थाओं के खूंटे से बंधे ऐसे अंध विश्वासों की जंजीरों से कसे हुए हैं जिनसे मुक्ति मिलना संभव दिखाई नहीं देता। पर्यावरण के संरक्षण की जिम्मेदारी को व्यक्तिगत स्तर पर स्वीेेकार करना महत्चपूर्ण नहीं रह गया। हमने ही मौसम को विचलित कर उसे प्रलयंकारी बना दिया। यह हमारा स्वार्थ है एक तरह का लोभ है जिसने मौसम की आपदा को दैवी आपदा जैसे शब्दों से मंडित करके अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया। हम विजयादशमी को रावण को जलाकर खुश होते हैं लेकिन उस वक्त जरा भी नहीं विचारते कि परंपरा जनित सामाजिक कुरीतियों की वजह से आज भी कितनी बेटियां मारी जा रही हैं। साक्षरता के नाम पर अक्षर ज्ञान और जोडऩा- घटाना ही नहीं बल्कि अंधविश्वासों से मुक्ति पाना भी है। सरकारें गरीबी का उन्मूलन नहीं कर रही बल्कि इस गाजरघास को नए नए तरीकों से फैला रही हैं। यह जानते हुए भी कि जब तक दर्दनाक सामाजिक विषमता की खाई बची रहेगी सतह के नीचे खौलते असंतोष और आक्रोश विस्फोटक बने रहेंगे। सरकारें भविष्य में होने वाले विस्फोटों से वास्ता नहीं रखतीं। सहानुभूति और सहिष्णुता परोपकार नहीं अपनी सुख शांति को निरापद रखने के लिए अनिवार्य है। हम दुनिया का गुरू बनने का सपना संजोए हुए हैं जबकि प्रकृति बार बार चेता रही है कि उसकी गर्दन पर मर्दन मत करो। हमारे साझे के सरोकारों से वास्ता रखने का वक्त सामने है। सुशिक्षित समाज हो, समाज का हर व्यक्ति स्वस्थ हो। नारियां सशक्त हों, अमीरी गरीबी की दूरियां कम हों, जनसंख्या व्यवस्थित हो और पर्यावरण संकट ग्रस्त न हो। खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में काम हो। जल, जंगल और जमीन को संरक्षित और सुरक्षित किया जाए। यह सब हमारे हाथ में है। हमने ही सरकारों को चुना है तो हमारा ही कर्तव्य है कि सरकारों को कलाई पर थोथी उपलब्धियों के कलावे न बांधने दें न ही उनका चंदन तिलक कर उनके अभिमान को रावण जैसा बना दें। इस दिशा में प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में चल रही सरकार ने पर्यावरण ही नहीं सामाजिक सरोकारों से जुडऩे का पुरजोर प्रयास शुरू किया है। सीएम कमलनाथ ने उन सरोकारों को अपनी नीति में शामिल किया है जो अब तक दिखावे के रूप में थीं। प्रशासनिक स्तर पर सरकारी योजनाओं की विफलताओं को कमलनाथ के दीर्घ अनुभव ने भली भांति समझा है और शायद इसीलिए उन्होंने सामाजिक सरोकारों से जुड़ी तमाम योजनाओं पर स्वयं की निगाह जमा रखी है। वह राजकीय धर्म और सामाजिक धर्म को एक सूत्र में बांधकर रखने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं इसका परिणाम कम समय में ही प्रदेश में दिखाई देने लगा है। कमलनाथ के पूरे राजनीतिक जीवन में उनकी यह पहली अग्रिपरीक्षा है। अच्छाई की विजय को सुनिश्चित करने और स्थाई बनाने के लिए बिना डरे आगे बढ़े ऐसी कामना विजयादशमी पर कर सकते हैं। इस अग्रिपरीक्षा से डर नहीं रहे। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार प्रदेश में रावण दहन होने जा रहा है। अपेक्षा यही है कि प्रदेश के विकास में बाधक बने रावणों का कद अब और ऊंचा न हो।

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