February 19, 2018
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साहित्य

फ़क़ीराना तबीअत थी बहुत बेबाक लहजा था

bus itna yad hai

मैं था जब कारवाँ के साथ तो गुलज़ार थी दुनिया मगर तन्हा हुआ तो हर तरफ़ सहरा ही सहरा था

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फ़क़ीराना तबीअत थी बहुत बेबाक लहजा था

कभी मुझ में भी हँसता-खेलता इक शख़्स रहता था

 

बगूले ही बगूले हैं मिरी वीरान आँखों में

कभी इन रहगुज़ारों में कोई दरिया भी बहता था

 

तुझे जब देखता हूँ तो ख़ुद अपनी याद आती है

मिरा अंदाज़ हँसने का कभी तेरे ही जैसा था

 

कभी पर्वाज़ पर मेरी हज़ारों दिल धड़कते थे

दुआ करता था कोई तो कोई ख़ुश-बाश कहता था

 

कभी ऐसे ही छाई थीं गुलाबी बदलियाँ मुझ पर

कभी फूलों की सोहबत से मिरा दामन भी महका था

 

मैं था जब कारवाँ के साथ तो गुलज़ार थी दुनिया

मगर तन्हा हुआ तो हर तरफ़ सहरा ही सहरा था

 

बस इतना याद है सोया था इक उम्मीद सी ले कर

लहू से भर गईं आँखें न जाने ख़्वाब कैसा था

                                               मनीश शुक्ला

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