February 19, 2018
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साहित्य

सर

me tere sahar ka kirdar

तुझको अफ़सोस अगर है तो मुझे भी है ये, मैं तेरे शहर का किरदार नहीं हो पाया.

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सर झुकाने को मैं तैयार नहीं हो पाया ,
यूँ बुलंदी का मैं हक़दार नहीं हो पाया .

फ़ासले तेरे मेरी रूह को समझा न सके,
तू ये कह ले मैं वफ़ादार नहीं हो पाया.

निभ न पाए हों अलग बात है मेरे रिश्ते,
मैं मगर जिस्म का बाज़ार नहीं हो पाया .

सबकी आँखों के बहे अश्क़ मेरी आँखों से ,
ग़म का अपने कभी इज़हार नहीं हो पाया.

तुझको अफ़सोस अगर है तो मुझे भी है ये,
मैं तेरे शहर का किरदार नहीं हो पाया.

बेगुनाही में भी मैं तेरा गुनहगार रहा ,
तू ख़ता करके ख़तावार नहीं हो पाया.

मैं जो ख़ुद्दार था बाज़ों ने मुझे नोंच लिया.
मैं मगर कुनबे से ग़द्दार नहीं हो पाया .

                              सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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