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साधौ ये मुर्दों का गांव

पाक से रिश्ते सुधारने का प्रयास

भारत हमेशा अपनी ओर से पाकिस्तान से दोस्ताना रिश्ते बनाने की कोशिशें करता रहा है लेकिन पाक की ओर से कभी ऐसे प्रयास नहीं किए गए। पाक के नेता चाहे वह प्रधानमंत्री हों या फिर मंत्रिमंडल के सदस्य भारत की ओर दोस्ताना हाथ बढ़ाने से पहले अपने नाखूनों की धार को तेज कर लेते हैं जब भी रिश्तों को लेकर बातचीत का माहौल तैयार करने का कार्यक्रम तैयार किया जाता है ऐसी कोई न कोई हरकत पाकिस्तान की ओर से होती है, रिश्तों की चाशनी तैयार होने से पहले उसमें निबोली डालने का काम पाक की ओर से होता है। अकड़ और दंभ के पर्याय पाक नेताओं को भारत से रिश्तों के मधुर होने से लाभ होता दिखाई नहीं देता उनकी राजनीति और पद सिर्फ भारत के विरोध वह भी आतंकवाद तथा कश्मीर के मामले पर ही टिका हुआ है। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हार्ट आॅफ एशिया कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेकर वापस लौट आई हैं वहां उन्होंने पाक से रिश्तों को लेकर बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने का रास्ता तैयार किया है। उन्होंने कटीली राहों को फिर से साफ कर रेड कारपेट बिछाने की इच्छा जाहिर की है, उन्होंने कई मामलों में पूर्वाग्रहों को छोड़ने का संकेत भी दिया है वह आतंकवाद को भी बातचीत में शामिल करने और इस पर किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने का संकेत दिया है। पाक प्रधानमंत्री और संभवत: के सियासी लोग सुषमा स्वराज के कथन को समझ गए होंगे कि भारत क्या चाहता है। विदेश मामलों के एक्सपर्ट कहते हैं कि कम्पोजिट डायलॉग पर रजामंदी जल्दबाजी तो है, बेहद चौंकाने वाली भी है। क्या सरकार ने बातचीत के सभी आठों मुद्दों की गंभीरता परखी? ये सही है कि दोनों मुल्कों का भविष्य कश्मीर, सियाचीन समेत 8 मुद्दों से तय होगा। लेकिन पाक का रुख इन पर ट्रेडिशनल रहा है और भारत का भी। फिर आखिर इन पर बातचीत की पहल किस आधार और किस शर्त पर की जा रही है? ऊफा में मोदी-नवाज के बीच बनी रजामंदी को चंद महीनों में हुर्रियत को बुलाकर पाक ने तोड़ दिया था। क्या पाक ने हुर्रियत मुद्दा छोड़ दिया? कुछ भी साफ नहीं है। फिर मोदी सरकार के 180 डिग्री घूम जाने का राज क्या है? सच तो यह कि भारत की पाकिस्तान पॉलिसी साफ नहीं है। यह अहम मुद्दों पर भटकी हुई रही है। यही खासियत आज भी देखने को मिल रही है। यह भी कहा जा सकता है कि भारत इस्लामाबाद में बाहरी दबावों के कारण झुकता हुआ दिखा। यह भारत की प्रो-एक्टिव और रीयल पॉलिटिक्स पर बेस्ड फॉरेन पॉलिसी नहीं दिखाता। इसलिए भारत को इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है। एक्सपर्ट रहीस सिंह का कहना है कि ,रही बात आगे की की, तो इसमें ट्रेडिशनल रिजल्ट्स ही मिलेंगे। किसी बड़े बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगा। सभी जानते हैं कि पाकिस्तान की भारत को लेकर पॉलिसी इस्लामाबाद से नहीं रावलपिंडी (आर्मी हेडक्वार्टर्स) से होती है। पाकिस्तानी आर्मी की स्ट्रैटजी 1947 से लेकर अब तक वैसी है। इसलिए अच्छे नतीजों के प्रोपोगैंडा पर वक्त लगाना बेकार होगा। यह सही है कि पाकिस्तान की ओर से छद्म युद्ध जारी है और वह दुनिया के हर मंच पर जहां भी मौका मिलता है कश्मीर के मामले को उठाने का प्रयास करता है जबकि इस मुद्दे पर वह कई बार मुंह की खा चुका है लेकिन इस मुद्दे के बिना भारत पाक के बीच बातचीत संभव नहीं है। अनुभव तो यही कहता है कि पाक कभी भारत से शांतिपूर्ण और दोस्ताना रिश्ते चाहता ही नहीं क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो पाकिस्तानी नेता अवाम के सामने बेपर्दा हो जायेंगे। ऐसी स्थिति में अंदरूनी धमाकों से पाक हिल जायेगा।

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