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साधौ ये मुर्दों का गांव

बाबू कैसे बन गए करोड़पति

भष्टाचार पर लगाम कसने के जितने भी प्रयास हुए वह सब नाकाफी हैं। सरकार भले ही कहती हो कि वह भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कदम उठा रही है लेकिन इसके परिणाम देखने को नहीं मिले हैं। सरकारी विभागों के हर दफ्तर में हर टेबिल पर भ्रष्टाचार का पेपरवेट रखा हुआ है। दलालों के बिना काम कराना आज भी आसान नहीं है। सरकार भले ही आनलाइन व्यवस्था कर रही हो लेकिन इस व्यवस्था का लाभ आम लोगों के लिए परेशानी का एक और पड़ाव बन गया है। कुछ सरकारी विभागों का कामकाज तो पूरी तरह से दलालों के हाथ में हैं इनके बिना यहां काम कराना मुश्किल ही नहीं असंभव है। यहां निर्धारित प्रक्रिया के तहत काम करना पेचीदा है, इतने अडंगे लगाए जाते हैं कि लोग दलालों की शरण में पहुंच जाते हैं। प्रदेशभर के जिला यातायात कार्यालयों के हालात बेहद खराब हैं, इसके अलावा भी ऐसे कई विभाग हैं जहां बिना दलालों के काम संभव नहीं होता। सरकारी कर्मचारियों और दलालों के इस मजबूत रिश्ते को सरकार तोड़ नहीं सकी है। सीएम लाख दावे करें कि सरकारी विभागों को दलालों के चंगुल से मुक्त कराने में ऐतिहासिक सफलता मिली है लेकिन ऐसा कही दिखाई नहीं देता। दलाल और सरकारी कर्मचारियों के इस रिश्ते ने ही भ्रष्टाचार की जड़ों को और गहराई तक पहुंचा दिया है। एक ऐसा सिस्टम तैयार हो गया है जिसके बिना सरकारी कर्मचारी काम ही नहीं कर सकता। जानकार ताज्जुब होगा कि दलाल सरकारी प्रक्रिया की तमाम औपचारिकताओं को पूरा करते हैं और बाबू सिर्फ हस्ताक्षर करता है। हर काम की सरकारी फीस है इसके ऊपर कमीशन और दलाल की फीस है जिसका निर्धारण नही है लेकिन सरकारी बाबू की टेबिल पर रखा एक एक कागज हस्ताक्षर करने के साथ ही नोटों में तब्दील होता रहता है। बाबू कोई भी कागज बिना सेवाशुल्क के आगे नहीं बढ़ाता। ताज्जुब की बात है कि सरकारी दफ्तरों में बोर्ड लगाए गए हैं कि यहां निर्धारित शुल्क के अलावा किसी भी तरह का भुगतान किसी भी व्यक्ति को न करें, दफ्तरों में निगरानी के लिए कैमरे लगाए गए हैं पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। सरकारी दफ्तरों के बाबू ही नहीं अफसरों ने भी वसूली के लिए अपने लोग छोड़ रखे हैं ये पूरे भरोसे से वसूली करते हैं। सरकारी दफ्तरों के बाहर लगने वाले चाय पान के ठेलों पर भ्रष्टाचार की रकम रखी जाने लगी है। आज यदि किसी कर्मचारी के पास करोड़ों रुपये पाए जा रहे हैं तो यह उसकी वर्षों की कमाई है अर्थात वह वर्षों से भ्रष्टाचार कर रहा था, ताज्जुब होता है कि ऐसे कर्मचारी सरकार की निगाह में कैसे नहीं आते। जब ऐसे कर्मचारियों को पकड़ा जाता है तो सरकार वाहवाही लूटती है। यदि बाबूओं के पास करोड़ों की काली कमाई जमा है तो फिर कल्पना कर सकते हैं कि प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के पास कितना कालाधन जमा होगा। हाल में जो मामले सामने आए हैं उससे यह साबित होता है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा है बल्कि यह बढ़ा है। सरकार को भ्रष्टाचार मिटाने के संकल्प को पूरा करना है तो वह सरकारी कर्मचारियों, अफसरों की संपत्तियों की जांच किसी भरोसेमंद माध्यम से कराकर देख ले। सरकार ने कभी इस बात पर विचार नही किया कि आखिर किस तरह से बाबू और अफसर करोड़ों डकार रहे हैं। सिस्टम को बदलना संभव नहीं है क्योंकि सिस्टम बनाने वाले ही भ्रष्टाचार की नाव में सवार हैं।

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