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साधौ ये मुर्दों का गांव

मानसून की मेहरबानी

मानसून की मेहरबानी इंतजार कर रहे थे कि मानसून कब आयेगा, किसानों की आंखें आसमान पर तो आमजन की निगाह गर्मी से मुक्ति पाने की ओर लगी हुई थीं। जिन इलाकों में तालाब हैं वहां लोग इंतजार कर रहे थे कब यह लबालब हो जाएं। भीषण गर्मी और जलस्रोतों के सूखने से पैदा हुए त्रासदी के हालातों से जल्दी निजात मिलने का इंतजार हो रहा था। पूरे प्रदेश में बादलों की जमावट को लेकर कई बार अंदेशा होने लगा था कि इस बार भी मानसून कही धोखा न दे जाए। आमतौर पर जैसा कि होता है बारिश के लिए पूजा और टोकटे भी शुरू हो गए थे। प्रार्थना कुबूल हुई और बादलों ने ऐसा धमाल मचाया कि पूरे सीजन में जितना पानी गिरता है दो दिनों में ही पूरा हो गया। आंकड़े और अनुमान धरे रह गए, लक्ष्य भी पूरा हो गया। हालात तो ऐसे हो गए कि जहां पानी के लिए तरस रहे थे वहां बाढ़ की स्थिति निर्मित हो गई। किसानों को भरपूर पानी मिल गया और इतना कि खेत ही डूब गए यानि कि मौसम यदि ऐसा ही बना रहा तो इस सीजन की फसल मुश्किल में पड़ जायेगी। प्रदेश के कई गांव बाढ़ की चपेट में हैं कई का देश दुनिया से संपर्क टूट गया है सड़क मार्ग पूरी तरह से बाधित हो गए है। बीते दो दिनों में बादलों ने तबाही मचा दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां स्थिति बेहद खराब है वहीं शहरी इलाकों में भी हालात बद से बदतर हो गए हैं। राजधानी भोपाल के ही कई इलाके जलमग्न हो चुके हैं। स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को राजधानी के इन डूबे इलाकों का दौरा कर रेस्क्यू आपरेशन चलाने के निर्देश देना पड़े। विधायक विश्वास सारंग और सासद आलोक संजर ने भी प्रभावित इलाकों का दौरा किया। विश्वास ने तो पानी में फंसे लोगों को स्वयं नाव से बाहर निकालने में मदद की। राजधानी में बारिश का सर्वाधिक असर नरेला विधानसभा में ही अधिक है। महापौर आलोक रात भर कंट्रोल रूम में स्वयं फोन अटेंड करते रहे।वार्ड 79 के पार्षद बब्लेश राजपूत ने कमर तक पानी में उतरकर लोगों को राहत पहुंचाने की हिम्मत दिखाई वह दिन रात बचावकार्य में जुटे रहे। इधर मुख्यमंत्री ने हालात को देखते हुए तत्काल आपात बैठक बुलाकर मंत्रियों को अपने अपने क्षेत्रों मे कमान संभालने के निर्देश दिए वहीं प्रशासनिक अमले को चौकन्ना रहने को कहा। ग्रामीण क्षेत्रों में मानसून के पानी से बर्बादी की बात तो समझ में आती है क्योंकि यहां बचाव के विकल्प कम होते हैं और राहत पहुंचने में देर लगती है लेकिन शहरी क्षेत्रों में बाढ़ जैसे हालात बनना प्रशासन की मानसून पूर्व की गई व्यवस्थाओं को कटघरे में खड़ा करती है। शहरी क्षेत्रों में पानी की निकासी के लिए गर्मी के दिनों में ही नालियों और बड़े नालों की सफाई का काम युद्धस्तर पर किया जाता है लेकिन पानी बरसते ही यह व्यवस्थाएं मुंह चिढ़ाने लगती हैं। स्पष्ट है कि जिस तरह से व्यवस्थाएं की जानी चाहिए वह नहीं की जाती, नाले और नालियों में हो चुके अतिक्रमणों को हटाने की हिम्मत कभी नगर निगम नहीं करता। इसके कारण कई इलाकों में बरसात ही नहीं पानी भराव की समस्या बनी रहती है। स्थानीय प्रशासन और नगर निगम वर्षों से उन इलाकों को चिन्हित कर चुका है जहां बरसात के दिनों में परेशानी होती है लेकिन कभी वह इन इलाकों से पानी निकासी में बाधक निर्माणों को नहीं हटाता। सामान्यतौर से उन इलाकों में पानी भर गया है जहां पानी निकासी की पुख्ता व्यवस्था नहीं है इन इलाकों में झुग्गी बस्तियां या निचले रहवासी क्षेत्र ही नहीं बल्कि पॉश कालोनियां भी हैं जहां पानी निकासी की व्यवस्था नहीं की गई है। आलाीशान कालोनियों में भी पक्की सड़के तो हैं लेकिन नालियों का निर्माण नहीं कराया गया है जिसके कारण बाढ़ जैसे हालात देखने को मिल रहे हैं। नगर निगम को सख्ती कर व्यवस्थाओं को दुरुस्त बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
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