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साधौ ये मुर्दों का गांव

उत्तर प्रदेश फतह की चौसर

उत्तर प्रदेश फतह की चौसर उत्तर प्रदेश में चुनाव संभवत: दिसम्बर या फरवरी में होंगे, पर अभी इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, फिर भी यहां का राजनीतिक माहौल गर्मा गया है। स्वामी प्रसाद मौर्य और आरके चौधरी के बसपा छोड़ देने से यहां का माहौल कुछ अधिक गरम दिखाई दे रहा है। विपक्षी इसका पूरा पूरा लाभ उठाने की फिक्र में हैं इनका मानना है कि इन दो नेताओं के बसपा छोड़ने से पार्टी की कमर टूट गई है। दूसरी ओर सपा की स्थिति मजबूत करने की गरज से अखिलेश ने मंत्रिमंडल का विस्तार कर असंतुष्टों और राजनीतिक समीकरणों को साधने का प्रयास किया है। कांगे्रस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर अभी कागजों पर दावा कर रहे हैं कि कुछ ही दिनों में प्रदेश का माहौल कांगे्रस के पक्ष में बनना शुरू हो जायेगा। कांग्रेस ने हालांकि उन्हें अपनी योजनाएं बनाने के लिए फ्री हैण्ड दिया है लेकिन उन्हें लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ असहज महसूस कर रहे है। भाजपा इन सबके बीच अपनी रणनीति बनाने में जुटी है पार्टी अध्यक्ष अमित शाह दौरा करके माहौल को अपने पक्ष में करने की तैयारी करने में जुट गए हैं। लेकिन अभी ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा जिससे कि यह कहा जा सके कि फलां पार्टी सत्ता पर काबिज होगी। सरकार बनाने के दावों में हालांकि कोई पीछे नहीं है, पर जानकार जानते हैं कि यह उत्तर प्रदेश है यहां अनुमान, सर्वे और आंकलन का भरोसा नहीं किया जा सकता, सब के सब कब औधे मुंह गिर जायेंगे पता ही नहीं चलेगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति को आज तक कोई नहीं समझ पाया है यहां ऊंट के बैठने का इंतजार करते रहते हैं और वह अनुमान के विपरीत दिशा में ही बैठ जाता है। गौर से देखा जाए तो अभी भाजपा यहां कहीं दिखाई नहीं दे रही है जबकि बसपा को उम्मीद है कि लोग उसे सपा से रुष्ट होकर स्वत: ही वोट देंगे क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं है। लेकिन मौर्य और चौधरी ने पार्टी छोड़कर बसपा का सपना तोड़ दिया है। टिकट बेंचने के आरोप में इन दोनो ने पार्टी छोड़ने के कारण को उजागर किया है जबकि हकीकत यह है कि यह काम बसपा में बहुत पहले से हो रहा है। यहीं वजह है कि पार्टी ने दलितों की ओर से अपना ध्यान हटाकर पूंजीपतियों की ओर दिया यहां तक कि उसने सवर्णों के खेमें में भी सेंध लगा दी। मौर्य और स्वामी राजनीतिक शुद्धता की ओर भी इशारा कर रहे हैं लेकिन उनकी इस बात में दम नहीं है। हकीकत यह है कि बसपा शासनकाल को लेकर लोग अभी तक नाराज हैं और वह दुबारा इसे सत्ता सौंपना नहीं चाहते। सपा और बसपा के विजय रथ का पहिया बसपा ने पकड़ रखा है और कांग्रेस अपनी ताकत के कमजोर होने का कारण बसपा को मानती है। इधर अखिलेश ने मंत्रिमंडल में विस्तार कर पार्टी में एकजुटता बनाने का प्रयास किय लेकिन इस प्रयास में वह अधिक सफल होते दिखाई नहीं दे रहे हैं क्योंकि ऐसे कई कद्दावर नेता मंत्री बनने से रह गए हैं जिनका जनाधार है वह भले ही अभी चुप हों लेकिन चुनाव में जरूर पार्टी के लिए घातक सिद्ध होंगे। भाजपा को अभी अपने विकास के नारे पर भरोसा नहीं हो रहा है वह मथुरा और कैराना के मुद्दे को ही केंद्र में रखकर मैदान मारने की जुगत में है। हो सकता है यह सांप्रदायिक मुद्दे उसके लिए घातक हों लेकिन अभी वह इसे ही भुनाने के मूड में दिखाई दे रही है। इधर कांग्रेस अभी प्रियंका के भरोसे बैठी है। यानि यह साफ हो गया है कि राहुल और सोनिया का करिश्मा खत्म हो गया है।
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