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साधौ ये मुर्दों का गांव

परेशानी से सबक लें

परेशानी से सबक लें डॉ.राहुल रंजन प्रकृति पर किसी का जोर नहीं चलता, वह अपनी मर्जी की मालिक है लेकिन हमे तो सचेत रहना चाहिए, हम यह क्यों भूल जाते हैं कि अपनी सुविधा के लिए जिन विकल्पों को तैयार कर रहे हैं वही एक दिन मुशीबत का कारण बन सकते हैं। यह पता है कि मानसून के सीजन में पानी गिरेगा और कितना गिरेगा इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। बारिश से बचने के हम अपने घरों की छतों को व्यवस्थित करने में जुट जाते हैं पूरी कोशिश करते हैं कि घर के अंदर बूंद भर भी पानी न टपके। लेकिन कभी घर के बाहर ध्यान नहीं देते, कभी नालियों की सफाई नहीं करते, सफाई तो दूर नालियों पर ही पक्के निर्माण कर अपनी सुविधाएं जुटा लेते हैं, पानी निकलने के तमाम रास्तों को हम बंद कर देते हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि बारिश का पानी उनके घरों में न जाए। हम कचरा फेंकते हैं घर के बाहर, अमूमन तो कचरा नालियों में ही फेंका जाता है कभी इसे निगम द्वारा रखी गई कचरा पेटियों में नहीं फेंका जाता, यह भी मोहल्ले में जो भी खाली प्लाट दिखाई देता है वहां कचरे का अंबार लगा दिया जाता है। पालीथिन जो कि सबसे अधिक परेशानी का कारण हैं, इसका प्रचलन बंद नहीं हो रहा और उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, इन्हें उपयोग के बाद फेंक दिया जाता है यह नालियों में ही फंसी रहती हैं। याद होगा मुंबई इसी पालीथीन के कारण एक बार भयानक तबाही झेल चुका है। हमने बारिश के पानी से बचने के उपाय सिर्फ अपने लिए किए हैं, हम सिर्फ अपना घर सुरक्षित करने की फिक्र में रहते हैं यही मानसिकता सबमें घर कर गई है नतीजा सब अपने अपने घरों को पानी से बचाने में जुटे हुए हैं लेकिन क्या यह संभव हुआ। हमारी लापरवाही का नतीजा सामने है राजधानी भोपाल ही नहीं बल्कि आस पास के शहरों और कस्बाई इलाकों में घरों में पानी घुस गया है लोग फंसे हुए हैं, घर का सामान बर्बाद हो चुका है, खाने को नहीं बचा है, जान के लाले पड़े हुए हैं। इन हालातों के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन को दोषी बताया जा रहा है लोग जीभर कर व्यवस्थाओं को कोस रहे हैं जनप्रतिनिधियों को खरी खोटी सुना रहे हैं। आखिर उनका दोष क्या है वह तो अपनी ओर से तमाम व्यवस्थाएं करते हैं लोगों को जागरूक करते हैं कि वह पानी निकासी के तमाम स्रोतों में कचरा न डालें, नालियों और नालों पर अतिक्रमण न करें लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं होता। अतिक्रमण करना तो लोग अपनी शान समझते हैं नतीजा बरसात का पानी बस्तियों से बाहर निकल नहीं सका और उसने तबाही मचा दी। हम अपनी गलतियों का ठीकरा प्रशासन के माथे पर फोड़ने का हक नहीं रखते क्योंकि जब हम अच्छे नागरिक बनने का फर्ज ही पूरा नहीं करते तो ऐसी अपेक्षा करना फिजूल है। जब हम घर का छप्पर सुधार सकते हैं, तो फिर घर से सामने की नालियां साफ करने के लिए प्रशासन का क्यों मुंह देखते हैं। स्थानीय व्यवस्थाएं देखने वाले सरकारी महकमें हर व्यक्ति के घर के सामने तो नहीं बैठे रहेंगे हमारा भी तो कुछ फर्ज है तो फिर इसे निभाने में शर्म क्यों। अब जब मानसून ने तबाही मचा दी है तो प्रशासन की राहत का इंतजार कर रहे हैं क्या इससे नुकसान की भरपाई होना संभव है। शायद नहीं , तो फिर हमेशा के लिए जब घर की छप्पर सुधारो उसी दिन नाली भी साफ करो, लोगों को नालियों में कचरा डालने से रोको, इन पर अतिक्रमण करने की मंशा मत करो। अन्यथा यह तबाही आने वाले सालों में और भी विकराल होती जायेगी। क्योंकि जिस तेजी के साथ आबादियां विकसित हो रही, समस्याएं भी उसी तेजी के साथ बढ़ रहीं हैं। बिना सोच बदले प्रकृति का सामना करना संभव नहीं है इसलिए सोच बदलें। प्रकृति पर किसी का जोर नहीं चलता, वह अपनी मर्जी की मालिक है लेकिन हमे तो सचेत रहना चाहिए, हम यह क्यों भूल जाते हैं कि अपनी सुविधा के लिए जिन विकल्पों को तैयार कर रहे हैं वही एक दिन मुशीबत का कारण बन सकते हैं। यह पता है कि मानसून के सीजन में पानी गिरेगा और कितना गिरेगा इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। बारिश से बचने के हम अपने घरों की छतों को व्यवस्थित करने में जुट जाते हैं पूरी कोशिश करते हैं कि घर के अंदर बूंद भर भी पानी न टपके। लेकिन कभी घर के बाहर ध्यान नहीं देते, कभी नालियों की सफाई नहीं करते, सफाई तो दूर नालियों पर ही पक्के निर्माण कर अपनी सुविधाएं जुटा लेते हैं, पानी निकलने के तमाम रास्तों को हम बंद कर देते हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि बारिश का पानी उनके घरों में न जाए। हम कचरा फेंकते हैं घर के बाहर, अमूमन तो कचरा नालियों में ही फेंका जाता है कभी इसे निगम द्वारा रखी गई कचरा पेटियों में नहीं फेंका जाता, यह भी मोहल्ले में जो भी खाली प्लाट दिखाई देता है वहां कचरे का अंबार लगा दिया जाता है। पालीथिन जो कि सबसे अधिक परेशानी का कारण हैं, इसका प्रचलन बंद नहीं हो रहा और उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, इन्हें उपयोग के बाद फेंक दिया जाता है यह नालियों में ही फंसी रहती हैं। याद होगा मुंबई इसी पालीथीन के कारण एक बार भयानक तबाही झेल चुका है। हमने बारिश के पानी से बचने के उपाय सिर्फ अपने लिए किए हैं, हम सिर्फ अपना घर सुरक्षित करने की फिक्र में रहते हैं यही मानसिकता सबमें घर कर गई है नतीजा सब अपने अपने घरों को पानी से बचाने में जुटे हुए हैं लेकिन क्या यह संभव हुआ। हमारी लापरवाही का नतीजा सामने है राजधानी भोपाल ही नहीं बल्कि आस पास के शहरों और कस्बाई इलाकों में घरों में पानी घुस गया है लोग फंसे हुए हैं, घर का सामान बर्बाद हो चुका है, खाने को नहीं बचा है, जान के लाले पड़े हुए हैं। इन हालातों के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन को दोषी बताया जा रहा है लोग जीभर कर व्यवस्थाओं को कोस रहे हैं जनप्रतिनिधियों को खरी खोटी सुना रहे हैं। आखिर उनका दोष क्या है वह तो अपनी ओर से तमाम व्यवस्थाएं करते हैं लोगों को जागरूक करते हैं कि वह पानी निकासी के तमाम स्रोतों में कचरा न डालें, नालियों और नालों पर अतिक्रमण न करें लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं होता। अतिक्रमण करना तो लोग अपनी शान समझते हैं नतीजा बरसात का पानी बस्तियों से बाहर निकल नहीं सका और उसने तबाही मचा दी। हम अपनी गलतियों का ठीकरा प्रशासन के माथे पर फोड़ने का हक नहीं रखते क्योंकि जब हम अच्छे नागरिक बनने का फर्ज ही पूरा नहीं करते तो ऐसी अपेक्षा करना फिजूल है। जब हम घर का छप्पर सुधार सकते हैं, तो फिर घर से सामने की नालियां साफ करने के लिए प्रशासन का क्यों मुंह देखते हैं। स्थानीय व्यवस्थाएं देखने वाले सरकारी महकमें हर व्यक्ति के घर के सामने तो नहीं बैठे रहेंगे हमारा भी तो कुछ फर्ज है तो फिर इसे निभाने में शर्म क्यों। अब जब मानसून ने तबाही मचा दी है तो प्रशासन की राहत का इंतजार कर रहे हैं क्या इससे नुकसान की भरपाई होना संभव है। शायद नहीं , तो फिर हमेशा के लिए जब घर की छप्पर सुधारो उसी दिन नाली भी साफ करो, लोगों को नालियों में कचरा डालने से रोको, इन पर अतिक्रमण करने की मंशा मत करो। अन्यथा यह तबाही आने वाले सालों में और भी विकराल होती जायेगी। क्योंकि जिस तेजी के साथ आबादियां विकसित हो रही, समस्याएं भी उसी तेजी के साथ बढ़ रहीं हैं। बिना सोच बदले प्रकृति का सामना करना संभव नहीं है इसलिए सोच बदलें।
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