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साधौ ये मुर्दों का गांव

सियासत में फंस गए रामलला

सियासत में फंस गए रामलला
बाबरी मस्जिद के सबसे बुजुर्ग मुद्दई हाशिम अंसारी के निधन से राम मंदिर विवाद का एक युग समाप्त हो गया है। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनके जीते जी रामलला का मंदिर बन जाए लेकिन वह अधूरी रह गई। याद है एक बार उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि रामलला की दुर्दशा अब देखी नहीं जाती उन्हें आजाद देखना चाहता हूं। हाशिम को भले ही देश का हिन्दू समुदाय कट्टर मुस्लिम के रूप में देखता हो और उन्हें राम मंदिर निर्माण में सबसे बड़ा रोड़ा मानता हो लेकिन संभवत: ऐसा नहीं है। हाशिम रामलला को सियासत से दूर रखने के पक्षधर थे लेकिन देश के सियासतदारों ने महज वोट के लिए इस मामले को उलझा दिया, और इतना उलझा दिया कि रामलला चक्रव्यूह में फंस गए। वह कब इस चक्रव्यूह से बाहर निकलेंगे कोई बता नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार तारीख बनकर रह गया है। बहुत संभव था इस मामले में यदि सियासत नहीं होती तो अब तक रामलला आजाद हो चुके होते, लेकिन सियासतदारों की इच्छा ऐसी कभी नहीं रही, वह कहते जरूर हैं पर चाहते नहीं कि रामलला कभी आजाद हों। हाशिम का पूरा जीवन कोर्ट के चक्कर काटते बीत गया पर फैसला उनके मरने के बाद भी नहीं आ सका। आखिर हम किस न्याय प्रक्रिया की दुहाई देते हैं। रामलला हमारी आस्था, सम्मान, गौरव के पर्याय हैं पर सियासत ने उन्हें उनसे सब कुछ छीन लिया। मंदिर के नाम पर देश में उन्माद और सांप्रदायिकता फैलाकर दिल्ली की कुर्सी पर बैठने का सपना पूरा हो गया पर आज उन्हीं लोगों ने रामलला के मंदिर को अपने एजेन्डे से किनारे कर दिया है। यह कहना ठीक नहीं है कि अयोध्या में राम मंदिर बनने से मुस्लिमों को तकलीफ है, तकलीफ सिर्फ उन मुसलमानों को है जो इस मुद्दे पर सियासत कर रहे हैं। ताज्जुब की बात नहीं जितने हिन्दू राम को नहीं पूजते उतने मुसलमान राम नाम के बिना निवाला भी मुंह में नहीं डालते। अयोध्या में राम को पूजने वाले सबसे अधिक मुसलमान ही हैं और उनकी सेवादारी भी वही करते हैं। राम मंदिर विवाद में कभी हाशिम और मंदिर ट्रस्ट के मंहतों के बीच कभी मनमुटाव नहीं रहा, दोनों ही इस मामले का जल्द निराकरण होने, कोर्ट का फैसला जल्दी होने का इंतजार कर रहे थे। धीरे धीरे कुछ महंत जो सीधे इस मामले से जुडेÞ थे बैकुंठ सिधार गए यहां तक कि विश्वहिन्दू परिषद के अग्रणी नेता और राममंदिर की लड़ाई लड़ने वाले अशोक सिंहल भी अब नहीं रहे। कार सेवा के नाम पर जो बाबरी विध्वंस हुआ था उससे जुड़े तमाम नेता मुकदमेबाजी में फंसे हुए हैं। इतनी अड़चनें राम मंदिर के निर्माण में खड़ी हो चुकी हैं कि इसका निर्माण इस सदी का सपना ही है।अभी अभी बीती ईद हाशिम को बधाई देने महंत ज्ञानदास पहुंचे थे तब उन्होंने कहा था कि मंदिर मस्जिद मुद्दे का हल निकाले बिना अयोध्या का विकास संभव नहीं है, हमे मंदिर चाहिए लेकिन खून से सना मंदिर नहीं। अब हाशिम के न रहने पर हो सकता है कि इस मामले की दिशा ही बदल जाए।

 

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