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साधौ ये मुर्दों का गांव

कठोर हो भ्रष्टाचार की सजा

कठोर हो भ्रष्टाचार की सजा
भ्रष्टाचार को रोकने के जितने भी प्रयास किए जा रहे हैं वह नाकाफी हैं इनसे संतोषजनक परिणाम मिलने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। क्योंकि भ्रष्टाचार करने वालों को सजा देने में अब भी सरकारें कंजूसी कर रही हैं, वर्षों पुराने नियम कायदों के तहत सजाएं तय होती हैं जो इस पर लगाम नहीं कस सकतीं। इन नियमों में इतने पेंच हैं कि भ्रष्टाचारी को निकलने के रास्ते मिल जाते हैं और वह भ्रष्टाचार करने के बाद भी पद विहीन रहने के बाद भी सरकारी सुविधाओं, वेतन भत्तो का मजा लेता रहता है। सरकार भ्रष्टाचारियों में वह खौफ पैदा नहीं कर पा रही है जिससे कि भ्रष्टाचार करने वाले को सड़क पर गिरे पैसे को उठाने में भी डर लगे। आजादी के बाद से देश में बुराइयों की तादाद तेजी से बढ़ी है उनमें सबसे अधिक क्षति पहुंचाने वाला कारक भ्रष्टाचार ही है इसके कारण देश के विकास की रफ्तार कम रही है। सरकारी खजाने के पैसे का अधिकतर हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। नौकरशाह हों या नेता सबने मिलकर राष्ट्र को लूटने का काम किया है। आज नेताओं और सरकारी कर्मचारियों के पास अरबों करोंड़ों की संपत्ति मिल रही है, कभी इस बात का पता लगाने की कोशिश नही ंकी गई कि यह आखिर किस विधि से कमाया गया धन है। इधर सौ में से दो सरकारी कर्मचारी भ्रष्टाचार करते पकड़े जाते हैं जबकि सौ में से अस्सी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार कर रहे हैं लेकिन यह पकड़े नहीं जाते। भ्रष्टाचार को सेवाशुल्क का नया नाम देकर वैधानिक कर दिया गया है। लाख रुपये के काम में किस किस का कितना कितना हिस्सा होगा, बिल बनाने वाले बाबू से लेकर मौका निरीक्षण करने वाले बाबू तक का कमीशन तय है। यह रोग पंचायतों के माध्यम से गांव गांव तक पहुंच चुका है, पटवारी हो या पंचायत सचिव सबके सब जमकर लूट रहे हैं। यह लोग पकड़े जाते हैं तो दंड के तौर पर निलंबन की कार्रवाई होती है, विभागीय या अन्य जांच बैठा दी जाती है, मुख्यालय बदल दिया जाता है, पद और कार्यविहीन कर दिया जाता है लेकिन उससे कभी रिकवरी नहीं की जाती। जबकि होना यह चाहिए कि जो भी भ्रष्टाचार की जद में आए उसे नौकरी से तत्काल निकाल दिया जाए और उसे जेल भेज दिया जाए इसके बाद उसकी तमाम संपत्ति कुर्क कर दी जाए इतना ही नहीं उसने सरकारी नौकरी के दौरान जितने वेतन भत्ते लिए हैं उसकी वसूली की जाए। इसमें सबसे बड़ा कदम यह उठाने का सुझाव है कि भ्रष्टाचारी के परिवार के किसी भी सदस्य को सरकारी नौकरी प्रतिबंधित कर दी जाए। यह एक ऐसा अस्त्र है जिसका खौफ परिवार को भी जगा देगा, गलती की सजा में जब परिवार शामिल होगा तब जाकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सफलता मिलेगी। वर्तमान व्यवस्था में भ्रष्टाचारियों को बचने और बचाने के विकल्प अधिक हैं इन पर सीधी कार्रवाई नहीं होती, बड़े अफसरों पर तो सरकार भी हाथ नहीं डालती, और तो और ऐसे मामलों की जांचे वर्षों चलती है, मामले कोर्ट में पहुंच जाते हैं और इस दौरान कर्मचारी की सेहत पर कोई फर्क नहंी होता। अभी तक भ्रष्टाचार के मामलों में नेताओं पर बहुत कम ही आंच आती है जबकि ये ही इसके रास्ते तैयार करते हैं। कालेधन को लेकर सरकार कथित रूप से परेशान दिखाई दे रही है वास्तव में वह इस धन को निकालने के लिए कड़ा रुख अपनाने के मूड में नहीं है। वह सिर्फ गीदड़ भभकी दे रही है और इसी डर से कुछ मामले सामने आ गए हैं जिसे वह सफलता मान रही है। इतना आसान नहीं है भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना, यह तभी संभव है जब ठोस और दनादन कार्रवाई हो, जेल भेजे जाएं, संपत्तियां कुर्क हो, नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाए। इसमें किसी तरह का दबाव न हो। सरकार इसके लिए अलग से एक विभाग बनाए जो स्वतंत्र हो सभी आदेश निकालने के लिए। अभी भ्रष्टाचार रोकने के लिए जो एजेन्सियां हैं वह सभी विवादों से मुक्त नहीं हैं।

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