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साधौ ये मुर्दों का गांव

दलित ही हैं लोकतंत्र का आधार

दलित ही हैं लोकतंत्र का आधार
यदि भारत में दलितों को ही लोकतंत्र का आधार मान लिया गया है तो सवर्ण कही जाने वाली जातियों को इस व्यवस्था से किनारा कर लेना चाहिए। यदि दलितों के वोट पर ही सरकारें बन रही हैं तो फिर सवर्ण जातियों को वोट देने का औचित्य क्या है। देश के नेताओं को यदि ऐसा महसूस होने लगा है कि उनकी नेतागिरी सिर्फ दलितों के भरोसे ही चल रही है तो फिर सवर्णों को सोचना चाहिए क्योंकि यदि अभी नहीं सोचा गया तो आने वाले समय में चंद प्रतिशत दलित वोटों पर सरकारें बन जायेंगी और सवर्ण बैठे मुंह देखते रहेंगे। क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में तीस प्रतिशत वोट लेकर भी सता पर काबिज हुआ जा सकता है विधानसभा और लोकसभा चुनाव जीते जा सकते हैं। मतलब सत्तर फीसदी लोगों का विरोध मायने नहीं रखता। इस संवैधानिक कमजोरी का लाभ अब बड़े स्तर पर उठाया जाने लगा है। राजनीतिक दल चाहे कोई भी हो वह सिर्फ दलितों की बात करता है, सिर्फ उनके हितों की चिंता की जा रही है, योजनाएं और सरकारी लाभ उन तक सीमित होते जा रहे हैं। दलित तो अब ऐसा एटीएम कार्ड हो गया है कि जो चाहे इसे हथियाने में जुटा हुआ है। बसपा जैसे राजनीतिक दल तो पहले से ही दलितों की वकालत कर रहे हैं लेकिन अब तो भाजपा जैसे राजनीतिक संगठन भी हिन्दुओं को छोड़ दलितों के ओसारे में बैठकर खाना खा रहे हैं। भाजपा का मानना है कि सवर्ण तो उसका स्थाई वोट बैंक है वह तो आंख बंद कर वोट देता है बस अब दलितों को साधने की जरूरत है सो उसने भगवा चोला उतार कर घुटने से ऊपर धोती बांध ली है, जूते की जगह पनहियां पहनने पर जोर दे रही है। सपा जैसे दल तो पहले से ही यादवो की दम पर राजनीति कर रहे हैं उन्हें यदुवंशियों की चिंता है और वह इन्हें घेरने में ही व्यस्त हैं, कहीं ये भाजपा की ओर न मुड जाएं, भाजपा भी लाख चाहे इन यदुवंशियों को गाय की कसम दिलाकर वोट नहीं ले सकती। पर गजब है भारत की राजनीति, यह तो पूरी तरह से दलित हो गई है जहां देखो वहां दलित का नारा बुलंद हो रहा है। एक इसे अपना परम्परागत वोट बैंक मानता है तो दूसरा इसमें सेंध लगाने में जुटा हुआ है तो तीसरा दो के बीच की सींगमारी का फायदा उठाना चाह रहा है। राजनीति का केंद्र अब सिर्फ दलित रह गए हैं ऐसा लग रहा है मानों यह देश सिर्फ दलितों का है वही इसके नीति निर्माता हैं। जो अगड़ी जातियों का दंभ भरते थे आज उन्हें उनकी वकालत करने वाले राजनीतिक दलों ने किनारे कर दिया है। अगड़ों और पिछड़ों की इस राजनीति से आने वाले वर्षों में देश में ऐसा जातीय संघर्ष होगा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। याद करें एक समय ऐसा भी था जब पिछड़ों और दलितों को सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल नहीं थी, उन पर अत्याचार होते थे, समय के बदलने का साथ आज दलित अगड़ी जातियों से कही आगे निकल गए हैं, उन्हें राजनीतिक स्वार्थों ने ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है कि वह कई मायनों में मजबूत हो गए हैं। वह भी समझ चुके हैं कि उनके बिना अब किसी भी राजनीतिक दल के लिए चलना संभव नहीं है। इसलिए वह इस मौके का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। लेकिन इस इज्जतनवाजी के परिणाम भी सामने आ रहे हैं दलितों पर होने वाले आक्रामण बढ़ रहे हैं यह देश की राजनीति के लिए शुभसंकेत नहीं हैं।

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