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साधौ ये मुर्दों का गांव

दाह संस्कार कहां करें

दाह संस्कार कहां करें
आजादी के बाद देश में अभी तक कुछ ऐसी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं जिन पर न कभी विचार किया जाता है और न ही यह कभी सरकारों की प्राथमिकता में शामिल है। कभी यह समस्याएं चुनावी एजेन्डे में शामिल नहीं की जाती। नगरीय निकाय भी इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान नहीं देते जबकि इससे लगभग हर परिवार प्रभावित होता है, इस सामाजिक जिम्मेदारी को निभाने की चेष्टा नहीं की जाती। यह समस्या है दाह संस्कार की। शहरों की बढ़ती आबादी के बावजूद श्मशान घाटों की संख्या को नहीं बढ़ाया गया है। हालात यह हैं कि जो पुराने श्मशान घाट हैं वहां व्यवस्थाएं आबादी के मान से कम पड़ने लगी हैं। सामाजिक संगठनों की चिंताओं और उनके द्वारा की गई आर्थिक मदद से श्मशान घाटों की व्यवस्थाएं चल रही हैं। राजधानी भोपाल में ही तीन श्मशान घाट हैं और अभी हाल में ही एक नया विकसित किया गया है। ये सभी के सभी शहर की सीमा और आबादी के अनुकूल नहीं हैं यहां बिना शव वाहन के पहुंचना आसान नहीं है, यहां यह भी जान लें कि शव वाहन भी सभी के लिए निशुल्क उपलब्ध नहीं है। राजधानी में इन श्मशान घाटों के अलावा भी कई और स्थानों पर भी इनका निर्माण किया गया है लेकिन यहां शव को जलाने तक की व्यवस्था नहीं है। न लकड़ी, न शेड और न ही प्रमाणपत्र की व्यवस्था यहां उपलब्ध कराई गई है और तो और इनकी जमीने भी अतिक्रमण की चपेट में आ चुकी हैं। राजधानी में जब इस व्यवस्था की ओर ध्यान नहीं है तो फिर पूरे प्रदेश खासतौर से ग्रामीण अंचलों में हालात कैसे होंगे इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो किसी परिवार में मौत का जितना दर्द नहीं होता उससे कही अधिक दर्द और चिंता शवदाह की होती है, कहां ले जाएं सोचने पर बाध्य होना पड़ता है। सूखे मौसम में तो कहीं न कहीं से जुगाड़ हो जाती है पर बारिश के मौसम में तो किसी परिवार में मौत का होना बेहद कष्टप्रद और दुखदायी होता है। इस बारे में कभी नेताओं ने चिंता नहीं की, वह दाह संस्कार की व्यवस्था करने में पूरी तरह से नाकाम रहे हैं और बातें करते हैं कि जीवन का अंतिम सफर सम्मानजनक होना चाहिए। बहुत दूर मत जाएं मध्यप्रदेश के सागर शहर से सटे कोरेगांव पहुंच जाएं। अगर इस गांव में किसी परिवार में कोई गमी हो जाती है जो उनके सामने दाहसंस्कार की समस्या इतनी बड़ी होती है कि वह दुख ही भूल जाते हैं क्योंकि गांव में एक भी मुक्तिधाम नहीं है। यहां करीब दो माह से गांव के लोग घरों के सामने ही दाह संस्कार कर रहे हैं और खौफ के साये में दिन-रात बिता रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें रात के समय घरों से बाहर निकलने में डर लगता है। रात में अंधेरा होने से और आसपास लाइट की व्यवस्था न होने से कुछ काम होने के बाद भी लोग घरों से बाहर नहीं निकलते। कुछ समय पहले तक गांव के बाहर मौजूद सेना की जमीन पर लोग दाह संस्कार करने जाते थे, लेकिन सेना ने करीब दो माह पहले बाउंड्री बनाकर मुक्तिधाम की ओर जाने वाला रास्ता बंद कर दिया है। गांव मकरोनिया नपा के अंतर्गत आने के कारण पार्षद ने मुक्तिधाम के लिए प्रस्ताव बनाकर नपा को दे दिया है, लेकिन अभी तक मुक्तिधाम नहीं बनाया। इस बारे में सीएमओ का जबाव उनकी निष्क्रियता की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करने वाला है वह कहते हैं कि प्रस्ताव तो आया है पर यह मामला बहुत बड़ा है इसलिए मुक्तिधाम कब तक बन पायेगा कह नहीं सकता। शर्म आना चाहिए नेताओं को जो बिला वजह के कामों में करोड़ो रुपये खर्च कर देते हैं लेकिन मरने वाले को सम्मान से दाह की व्यवस्था भी नहीं कर पाते।

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