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साधौ ये मुर्दों का गांव

हिंदी मातृ भाषा या मात्र भाषा ?

{सचिन श्रीवास्तव}
"हम संस्कृत के वो बेटे है जिसे हिन्दी ने पाला है ,अगर संस्कृत की रोटी है तो हिन्दी का निवाला है"
ये चन्द लाइने यूँ तो खरे सोने की तरह सच है परन्तु आज के इस घोर कलयुग में इन बातो में कोई ज़मीनी सच्चाई नजर नही आती , क्योकि कलयुग के इस दौर में हम हिन्दी से पलना नही चाहते है और न ही हिन्दी से रोटी कमाना भी नही चाहते है हाँ लेकिन कोई अगर हिन्दी प्रेमी हिन्दी बोले तो एक पिछड़ेपन या गँवारों की उपाधि जरूर दे देते है क्योकि हम अंग्रेजी मानसकिता से पूरी तरह ग्रसित हो चुके है ।
हमारी शिक्षा व्यवस्था जो की मैकाले की पद्धति पर चल रही है ,आजादी के 70 वर्ष बाद भी सत्ता दल जिसने सबसे ज्यदा राज किया उसने इसमें परिवर्तन की जरूरत नही समझी है उसका परिणाम हम भुगत रहे है और आगे आने वाली पीढियां भी भुगतेंगी ।
यूँ तो हिन्दी को हम माँ का दर्जा दिए है यानि की हिन्दी हमारी माँ है और आज हम अपनी माँ को छोड़ सौतन रूपी अंग्रेजी की और ध्यान दे रहे है अंग्रेजी बोलकर अपने आप को सभ्य मानने लगे है और चारो और अंग्रेजी की घनघोर काली घटाएँ छाने लगी है ज्यदातर लोग अग्रेजी पर निर्भर है और लोगो का तो ये मानना है कि इस देश में भी अंग्रेजी ही रोजगार दे सकती है ,चलो हम भी मान लेते है कि अंग्रेजी भले ही हमे रोजगार दे सकती है परन्तु अंग्रेजी संस्कार भी दे सकती है क्या ?
संस्कारो की बात में कर रहा हु तो शायद इस वजह से लोग मुझे साम्प्रदायिकता का तमगा भी देंगे ,और तो और भाषा विरोधी का भी प्रमाण पत्र थमाने में जरा भी देर नही करेंगे ।
ख़ेर छोड़िये लोगो की अब पुनः अपनी बात पर आते है ,
गत पिछले बर्ष भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन था देश विदेश से बड़ी बड़ी हस्तियों ने हिन्दी दिवस पर बड़े बड़े भाषण दिए उन सबसे उस समय मेरा सवाल था क्या आप अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम में पढ़ाते है ..........?
इस सवाल के जबाब से आप भी परिचरित होंगे और में भी की बड़े-बड़े लोग वो बाते करने है जो खुद पर लागू नही करते हालाँकि जिस प्रकार पाँचो उंगलियां एक समान नही होती वैसे ही सभी लोग एक जैसे नही होते है कुछ लोगो का हिन्दी प्रेम वाकई काबिले तारीफ़ है ।
वैसे हिन्दी भाषा के साथ जो बलात्कार हुआ है उसके जिम्मेदार हम भी है क्योकि हमने अपने मन में ठान लिया है कि हिन्दी पढ़कर कुछ नही होने वाला है ,परन्तु ऐसा नही है अगर हम यह ठान ले की हिन्दी के बिना कुछ नही होने देंगे तो फिर हिन्दी का खोया सम्मान वापस आ जाएगा ,
हमारे देश में सबसे ज्यदा युवा है या यूँ कहिये की हम युवाओ के देश में है और जिस दिशा में युवा चलता है उसी और दुनिया चलती है अगर हम युवा हिन्दी को अपना ले तो में दावे से कहता हूँ कि विश्व के देश हमारे इशारे पर नाचेंगे ।
कॉन्वेंट विद्यालय जो कि हिन्दी भाषा के सबसे बड़े दुश्मन है उनके द्वारा हरसंभव प्रयास किये जा रहे है हिन्दी को खत्म करने के कॉन्वेंट विद्यालयो में जो मुख्य शिक्षक जिसे प्राचार्य भी कहते है उसे फादर यानि की पापा बोलना अनिवार्य है विद्यालय में फादर बुलवा कर शिक्षा की आड़ में ईसाईनियत का प्रचार प्रसार है ये तो एक तरह से और तो और
एक स्थान के कान्वेंट विद्यालय में कोई बच्चा हिन्दी बोलता था तो उस बच्चे के गले में तख्ती डाल दी जाती थी जिस पर अंग्रेजी अनुवाद में लिखा होता था "में गधा हूँ क्योकि मेने हिन्दी बोली "
हालाँकि उस विद्यालय के प्राचार्य को सबक जरा अलग ढंग से सिखाया आम जनता ने लेकिन फिर भी उस विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों की भीड़ कम न हुई ।
जापान ,चीन जैसे बड़े देश जो की यंत्रो के लिए जाने जाते है इन्होंने कभी भी अंग्रेजी को प्राथमिकता नही है फिर भी इनके यन्त्र हम और आप उपयोग कर रहे है और ये देश अपनी भाषा की वजह से ही फल फूल रहे है ऐसे अनेको उदाहरण है देखा जाए तो और हम जानते भी है पर खुद पर अजमाने से कतरा रहे है या यूँ कहे की अंग्रेजी की अंधी दौड़ में हम भी शामिल हो गए है और सच्चाई से दूर भाग रहे है ,
हिन्दी की दशा इस देश में दयनीय होती जा रही है परन्तु अनेक देश मॉरीशस ,म्यांमार ,फिजी,फिनलैंड आदि देश हिन्दी के प्रति लगाब रख रहे है और इन देशो में हिंदुस्तानियो से नमस्कार, प्रणाम जैसे शब्दों से अभिवादन किया जाता है

आजकल की लड़किया जिनके  मुँह से अंग्रेजी के रस भरे शब्दों को सुनकर लड़के ऐसे लातूर हो जाते है जैसे की उनके कानो में शहद घुल गया हो । पहली मुलाकात में लड़का हिन्दी में अगर बात करे तो ये समझिये कि ये अंतिम मुलाकात थी लड़कियो के मन में अंग्रेजी को लेकर विशेष प्रेम जाग्रत हो गया है जिसे वो अपने प्रेमी के मुँह से भी सुनना चाहती है इस बात को प्रेमी समझ चुके है कि अंग्रेजी के बिना हम प्रेमिका को नही रिझा सकते भले ही टूटी फूटी अंग्रेजी क्यों न बोले ।
में कभी-कभी चिंतित हो जाता हु ये सोचकर कि जो नए वंश को इस भूमि पर लाता है उन माँ को ही जब हिन्दी नही आएगी तब उस बच्चे को संस्कार का हिन्दी के प्रति प्रेम कौन बताएगा और ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नही जब हिन्दी को भी पुरात्व विभाग के संग्रहालयो में देखा जाएगा ।

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