Powered By डॉ.राहुल रंजन
मीडिया गुरूजी

जनसंचार

जनसंचार का माध्यम टेलीविजनः-
टेलीविजन इन दो शब्दों को मिलाकर टेलीविजन शब्द बना है। टेली शब्द ग्रीक भाषा का है जिसका मतलब होता है दूरी। विजन शब्द लैटिन भाषा है। इसका अर्थ होता है देखना। इसको दूरदर्शन भी कहते है। साहित्यकार कमलेश्वर दूरदर्शन के विषय में कहते हैं कि दूरदर्शन सिनेमा नहीं है। दूरदर्शन अखबार भी नहीं है। यह रंगमंच या लोककलाओं का प्रदर्शन मंच भी नही है। यह एक कल्चर है फैक्टर है। जनसंचार का यह सर्वाधिक प्रभावशाली माध्यम है। रेडियों से केवल आवाज के साथ घटनाओं के चित्रों का हु-ब-हू आनंद लिया जा सकता है। इसको स्काॅटलैंड के जाॅन लोगी बेयर्ड ने 1922 में तैयार किया था।
टेलीविजन के आने से लोगों मेे यह आम धारणा घर कर गई कि अब रेडियों बंद हो जाएंगे। पर ऐसा सचमुच हुआ नहीं क्यों कि टेलीविजन को आम आदमी खरीदने में सक्षम न हो सका। टेलीविजन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में भी असुविधा हुई। रेडियों को लोग जेबों में रखकर इधर-उधर ले जा सकते थे। फिर भी टेलीविजन ने अपना अलग-स्थान बनाया। इसमें ध्वनि के अलावा प्रकाश, रंग, दृश्य का दर्शन मनोरंजन देने लगा। इसका प्रभाव साचर व निरक्षर दोनों किस्म के लोगों पर पड़ा। हजारां मील दूरी पर क्या घटित हो रहा है उसकी जानकारी से दर्शक रू-ब-रू हुआ है।
दूरदर्शन के माध्यम से बेयर्ड ने तस्वीरों को प्रभावशाली ढंग से प्रसारित किया। एम.एफ जेकिस ने पहली बार अमेरिका में तस्वीरे प्रसारित कीं। ध्वनि युक्त टेलीविजन का प्रसारण 1930 में हुआ। 1938 में फ्रंास में नियमित प्रसारण तथा 1941 में अमेरिका में प्रारंभ हुआ।1952 में फ्रंास इंग्लैड तथा जर्मनी में सफलतापूर्वक टेलीविजन का प्रसारण संपन्न हुआ। 1953 में रंगीन टेलीविजन ने अपनी दस्तक दी।
भारत में 15 सितंबर 1959 को देश की राजधानी यानी दिल्ली में दूरदर्शन केन्द्र का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद ने किया। देश में दूरदर्शन को स्थापित करने का मुख्य उद्देश्य स्कूली बच्चों को शिक्षित करना था। संचालन में यूनेस्कों का विशेष योगदान था। इस समय इसका प्रसारण दिल्ली के आसपास केवल 24 किलोमीटर की दूरी तक ही सीमित था।
भारत में दूरदर्शन के विाकस के लिए यूनेस्कों ने 20 हजार डाॅलर की सहायता राशि दी। दिल्ली के शिक्षा निदेशालय व फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से अक्टुबर 1961 में विद्यार्थियों के लिए शैक्षिक प्रसारण प्रारंभ किया गया। हिंदी,अंग्रेजी,विज्ञान,गणित जैसे विषयों का प्रसारण देखा गया। दिल्ली के 251 स्कूलों में टेलीविजन सेट लगाए गए। यूनेस्कांे के समाज वैज्ञानिक वी.पाल नूरथ को इस प्रसारण के परीक्षण के लिए आमंत्रित किया गया। भारत में दूरदर्शन की नियमित विकास यात्रा 1964 से प्रारंभ हुई। 15 अगस्त,1965 से भारत में दूरदर्शन पर नियमित रूप से एक घंटे का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। डाॅ. विक्रम सारा भाई के प्रयास से 1967 में अहमदाबाद में स्पेस एप्लिकेशन केन्द्र की स्थापना हुई। ग्रामीण दर्शकों के लिए‘कृषि दर्शन‘ कार्यक्रम की शुरूआत 26 जनवरी, 1967 में प्रारंभ हुई। इस सेवा का उद्घाटन श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया। प्रारंीा में कृषिदर्शन का यह कार्यक्रम 20 मिनिट का रखा गया बाद में इसकी अवधि बढ़ा दी गई। यह कार्यक्रम सप्ताह में तीन दिन दिखाया जाता था। भारत की ग्रामोन्मुखी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए गुजरात के खेड़ा का व्यावहारिक कार्यक्रम प्रसारण केन्द्र‘साइट‘ अब सेटेलाइट एजुकेशनल टेलीविजन अपने अनुभव के आधार पर विश्वविख्यात बनाया। साइट की सहायकता में आई.आई.टी. कानपुर, इंस्टीट्यूट आॅफ फन्डामेंटल रिसर्च एवं विक्रम सारा भाई कम्यूनिटी साइंस सेंटर की भूमिका विशेष रही।
1972-73 में मुम्बई, पूना तथा श्रीनगर में दूरदर्शन केन्द्र की स्थापना की गई। 29 सितंबर 1973 को अमृतसर, लखनऊ व कोलकाता से क्रार्यक्रमों का प्रसारण होने लगा। इसके बाद दूरदर्शन का नेटवर्क समूचे देश में फैल गया। 1 अप्रैल,1976 का आॅल इंडिया रेडियों से दूरदर्शन को अलग कर दिया गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने दूरदर्शन के निम्न उद्देश्य निर्धारित किए।
1. गरीब और निर्बल वर्गो हेतु सामाजिक कल्याण के उपायों पर बल देना।
2. राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करना।
3. सामाजिक परिवर्तन में प्रेरक भूमिका अदा करना।
4. जनसामान्य में वैज्ञानिक चेतनाओं का विकास करना।
5. परिवार कल्याण और जनसंख्या नियंत्रण करने के संदेश को प्रसारित करना।
6. भारत की कला और सांस्कृतिक गरिमा के प्रति जागरूकता पैदा करना।
7. खेलकूद को लोकप्रिय बनाना।
8. पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए उन सामान्य में जागरूकता लाना।
9. कृषि उत्पादन को प्रोत्साहत कर हरित क्रंाति और पशुपालन को बढ़ावा देकर श्वेत क्रंाति के लिए जनता को प्रेरित करना।
10. लोगो को सूचना, शिक्षा और मनोरंजन प्रदान करना।
जनता को शिक्षित करना, उनका मनोरंजन करना टेलीविजन की विशेषता रही है। फीचर, फिल्म, संगीत, गाने व्यावसायिक कार्यक्रम हैं। टेलीविजन के माध्यम से भारतीय सभ्यता, संस्कृति, धर्म, और आदर्शो पर आधारित ऐतिहासिक धारावाहिक रामायण, महाभारत,श्रीकृष्ध्ण् और जय हनुमान का फिल्मांकन करके सदियों पुराने इतिहास को जीवंत किया है। विरासत, समझ, घुटन, दर्द, नीम का पेड़, रजनी, कंुती,आपबीती जैसे सामाजिक धारावाहिकों ने वर्तमान समाज की त्रासदी और स्थितियों को उजागर किया है।
मनुष्य के विकास के लिए जितना लिखना-पढना आवश्यक है उससे ज्यादा सुनना व देखना भी है। जनसंचार सुनने व देचाने से बढ़ता है यह काम हमारा टेलीविजन कर रहा है। आज टेलीविजन जनसंचार ने दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। टेलीविजन अमीर व गरीब के बीच संचार पैदा कर हा है। टेलीविजन पर जो नज़र आता है, सुनाई देता है वह एक व्यवस्थित प्रक्रिया का कमाल है। दुनिया में हो रहा परिवर्तन का प्रभाव भारत में टेलीविजन के माध्यम से स्वीकारा जा रहा है। दर्शक समाज तक या यंू कहिए कि श्रोता वर्ग तक अपनी बात प्रभावी ढंग से पहुंचाने के प्रति टेलीविजन प्रतिबद्ध है। इसके जरिए समाचार, नाटक, धारावाहिक,ज्ञानवर्धक वृत्तचित्रों की गंूज से शिक्षा का उद्देश्य पीछे रह गया है। क्यों कि देश की अधिकांश जनता गांवों में निवास करती है। वह अशिक्षित है। उसको शिक्षित करना, विज्ञान एवं नई तकनीकों से जोड़ना सरकार का परम उद्देश्य होना चाहिए। आज मानव की जिंदगी नीरस होती जा रही ह। सरकारी माध्यम होने के कारण आज टेलीविजन पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। सरकारी नीतियां तो टेलीविजन का हिस्सा है मगर यदि टेलीविजन को नियंत्रित करने की कोशिश की जाएगी तो टेलीविजन की छबि बिगडेगी। जनसंचार प्रक्रिया अवरूद्ध होगी।
जब भाषा एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़ती है तो समाज बन जाता है। इस समाज को श्रेष्ठ बनाने के लिए मनुष्य दिन-प्रतिदिन खोज करता है। कागज पर शब्दों से खेलता है। लिखे व बोजे हुए शब्दों से सूचनाएं बनती हैं। समाज गतिमान होता है। जब नैतिकता शब्दों का जामा पहनती है। तब उसकी सार्थकता बढ़ती है। इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता से स्वतंत्रता, निष्पक्षता एवं निर्भीकता के अंकुर समाज को विश्वसनीय बनाते हैं। लोकचेतना जन्म लेती है। समाज की साफ-सुथरी झलक हमें दिखाई देने लगती है जनता की इच्छाशक्ति बढती है। यह एक के बाद एक घटना एवं सुनने को लालयित होती है। घटनाएं सुनना ही नहीं बल्कि निदान भी चाहती है। इलेक्ट्राॅनिक पत्रकारिता जब इन घटनाआं को पर्दे पर प्रस्तुत करती है तो मनुष्य इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों का दास बन जाता है। सुविधा की दृष्टि से उपर्युक्त घटनाओं पर निम्नलिखित नजर डाल सकते है।
दूरदर्शन
संचार की सर्वाधिक लोक-प्रचलित दृश्य-श्रव्य माध्यम है। दूरदर्शन वर्तमान तकनीकी युग की महत्तवपूर्ण भेंट है। तस्वीरों को प्रसारित करने की युक्ति सन् 1890 ई. में ज्ञात हो चुकी थी । 26 जनवरी, सन् 1926 को लंदन मे बी.बी.सी. द्वारा नियमित दूरदर्शन सेवा प्रारंभ की गई। मारकोनी कंपनी के इलेक्ट्राॅनिक कैमरा और रिसीविंग टयूब के विकास ने इसकी यांत्रिकी समस्याओं को तो दूर किया ही, तस्वीर और ध्वनि की गुणवक्ता में भी अपेक्षित सुधार किया। ध्वनि वाले दूरदर्शन का प्रथम सार्वजनिक प्रसारण ब्रिटेन में सन् 1930 में हुआ। धीरे-धीरे टेलीविजन सारी दुनिया में तेजी से फैलने लगा। फ्रंास में नियमित प्रसारण 1938 में प्रारंभ हुआ तथा 1941 में अमेरिका में प्रारंभ हुआ लेकिन द्वितीय विश्वयृद्ध के दौरान यूरोप में दूरदर्शन प्रसारण आकस्मिक रूप से बंद हो गया, फिर भी इस दिशा में प्रयोग चलते रहे। युद्धोपरांत दूरदर्शन की सेवाएं पुनः शुरू हुई। सन् 1953 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने सर्वप्रथम नियमित रंगीन दूरदर्शन प्रसारण प्रारंभ किया। 1955 ई. में यूरोविजन नेटवर्क विविवत देखा गया जिसमें ब्रिटेन, फ्रंास, इटली, डेनमार्क, स्विट्जरलैंडख् पश्चिम जर्मनी, बेल्जिमय और नीदरलैंड को जोडा गया। सन् 1962 में उपग्रह के द्वारा पहजे जीवंत कार्यक्रम का आदान-प्रदान यूरोप तथा अमेरिका के बीच हुआ। फिर तो युरोविजन ने व्यापक स्तर पर पूर्वी यूरोपियन नेटवर्क ‘इंटरविजन‘ के साथ कार्यक्रमों का आदान-प्रदान शुरू कर दिया। इसने स्केंडिनेवियन नेटवर्क ‘नाॅर्डविजन‘ के साथ सहयोग किया।
भारत में प्रथम प्रायोगिक दूरर्शन केन्द्र का उद्घाटन 15 सितंबर,1959 को तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा दिल्ली में किया गया। दिल्ली में आयोजित यूनेस्को सम्मेजन के अंतर्गत भारत में दूरदर्शन कार्यक्रम प्रारंभ करने हेतु 20,000 डाॅलर का अनुदान प्राप्त हुआ। जिसकी एक पायलट परियोजना के तहत अमेरिकी सरकार तथा फिलिप्स की सहायता से एक लघु दूरदर्शन केन्द्र की स्थापना की गई। 15 अगस्त 1965 से एक घंटे की दैनिक सामान्य सेवा प्रारंभ हुई। प्रारंभ में दूरदर्शन का उपयोग स्कूली शिक्षा एवं ग्रामीण के विकास को ध्यान में रखकर किया गया। 15 अगस्त,1965 को दूरदर्शन से सर्वप्रथम समाचार बुलेटिन प्रारंभ हुआ। 26 जनवरी 1967 से किसानों के बीच कृषि से संबंधित नई प्रौद्योगिकी संसाधनों, तकलीक आदि के प्रचार के लिए कृषि कार्यक्रम आयोजित किया गया। अगस्त 1975 से भारत में उपग्रह की सहायता से आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, गुजरात,बिहार और महाराष्ट्र के 2400 गंावों में दूरदर्शन सेवा प्रारंभ की गई। अप्रैल, सन् 1976 को चंदा समिति की सिफारिश पर दूरदर्शन और आकाशवाणी को अलग-अलग कर दिया गया और इसी वर्ष दूरदर्शन ने विज्ञापन -जगत में प्रवेश किया। 15 अगस्त 1982 को एशियाई खेलों से पूर्व दूरदर्शन का रंगीन प्रसारण प्रारंभ हुआ। 19 टेलीकाॅस्ट सेवा प्रारंभ की गई। 23 फरवरी,1987 से प्रातः कालीन प्रसारण सेवा का शुभारंभ हुआ। सन् 1993 में मेट्रो चैनल के साथ-साथ विदेशी चैनलों का आगमन हुआ। राष्ट्रीय प्रसारण की डी.1,2,3 में विभक्त हो गया। दूरदर्शन की आयु का प्रमुख स्त्रोत ‘दूरदर्शन विज्ञापन सेवा‘ का प्रारंभ वर्ष 1996 में हुआ।

उत्पादन टीम:-
टी.वी. और फिल्म में नियोजन
फिल्म एवं टीवी अलग-अलग क्षेत्र हैं, लेकिन इन दोनों में कई तकनीकी समानताएँ है। अनेक व्यावसायिक कोर्स ऐसे हैं जिन्हें करने के उपरांत टीवी तथा फिल्म -उद्योग दानों में नियोजन हो सकता है। कैमरामैन, आॅडियों विजुअल तकनीशियन, फिल्म सम्पादन, सिनमाटोग्राफी फिल्म-निर्देशन, मेकअप मैन तथा ग्राफिक आर्टिस्ट जैसे अनेक व्यावसायिक कोर्स ऐसे हैं जिसे करने के उपरांत छोटे व बड़े पर्दे से जुड सकते हैं।

 

उद्घोषक/समाचारवाचक
छोटे पर्दे पर उद्घोषक, समाचारवाचक के कार्यक्षेत्र को ‘एंकरिग‘ करना कहा जाता है। राष्ट्रीय दूरदर्शन तथा विभिन्न चैनलों में अलग-अलग ढंग से एंकरिंग की जाती है। एंकरिंग का प्रशिक्षण प्राप्त होने पर वरीयता मिल सकती है। जिस भाषा का एनाउंसर या सामाचारवाचक/वाचिका बनना है उस पर अधिकार होना चाहिए। प्रसारण के लिए उपयुक्त आवाज और स्पष्ट उच्चारण-क्षमता, दर्शनीय चेहरा, राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय घटनाक्रमों की सम्यक् जानकारी होनी चाहिए।

सह-समाचार सम्पादक - यह पद टीवी की पत्रकारिता में दिलचस्पी रखने वाले युवक-युवतियों के लिए है। उल्लेखनीय है कि उद्घोषकों/समाचारवाचकों की नियुक्ति टीवी प्रबंधन करता है। जबकि सह-समाचार सम्पादक, संवाददाता तथा उप सम्पादकों की नियुक्ति संघ लोकसेवा आयोग करता है। यह समाचार सम्पादक तथा उपसम्पादकों की रिपोर्टरों, एजेंसियों और अन्य माध्यमों से आए समाचारों का चयन एवं सम्पादन करना होता है।

संवाददाता - जो शैक्षिक योग्यता समाचार सम्पादक के लिए सुनिश्चित की गई है, वहीं संवादाताओं के लिए भी है। दोनों पदों पर नियुक्ति चयन-परीक्षा के आधार पर होती है। प्रतियोगी परीक्षा में भाषा ज्ञान, सामान्य ज्ञान एवं अतंराष्ट्रीय/राष्ट्रीय घटनाक्रमों से संबंधित प्रश्प पूछे जाते है। प्राइवेट टीवी चैनलों में समाचार सम्पादक/रिपोर्टर के लिए संघ लोकसेवा आयोग नियुक्ति नहीं करता, बल्कि वे स्वयं सुयोग्य उम्मीदवारों का चयन करते है। चैनलों में मान्यता प्राप्त या फिर किसी स्तरीय निजी प्रशिक्षण केन्द्र से टीवी पत्रकारिता कर चुके लोगों की नियुक्ति की जाती है या फिर प्रिंट मीडिया के पत्रकारों को सह-समाचार सम्पादक रिर्पोटर नियुक्त किया जाता है।
कैमरामैन- आजकल दो प्रकार के कैमरामैनों की माँग है- न्यूज कैमरामैन तथा फीचर कैमरामैन न्यूल कैमरामैन का कार्यक्षेत्र समाचार-संकलन (विजुअल) करना। दूरदर्शन (राष्ट्रीय) समाचार, आज तक, आँखों देखी, टु नाइट, इंडिया दिस वीक, सिटी चैनल, बी.आई टीवी, जी.टीवी सहित दर्जन भर से अधिक टीवी न्यूज प्रस्तुत करने वाले चैनल हैं, जहंा न्यूज कैमरामैन की आवश्यकता पड़ती है। सभी चैनल नेटवर्क स्वयं अपनी टीम द्वारा तैयार कराई गई खबों का प्रसारण करते हैं जिसके लिए कुशल एवं दक्ष कैमरामैन की आवश्यकता पड़ती है।

फिल्म, वीडियों सम्पादक-दूरदर्शन से फिल्म वीछियों सम्पादक का पद अति महत्तवपूर्ण होता है। इनका कार्यक्षेत्र है- मूक एवं सवाक चित्रों का सम्पादन, उपस्करों का अनुरक्षण, लाॅगबुक में ही नंबर लिखना, स्टाॅक शाॅट्स ध्वनि प्रभावों को क्रम में रखना, रिकाॅर्डिक के लिए लूप और डबिंग क्यू शीट तैयार करना, निगेटिव, प्रिंटों और ध्वनि ट्रैकों को बिछाने की जाँच करना, कम्प्यूटाइज्ड वीडियों एडीटिंग सीट में टाइम्स कोड का प्रयोग।
आॅडियों विजुअल तकनीशियन - आॅडियों विजुअल तकनीशियन का कार्यक्षेत्र है- ट्रंासप्रेंसी का इस्तेमाल, ग्राफिक चार्ट-निर्माण, पोस्टर, स्लाइड, मोशन पिक्चर आर्ट वर्क इत्यादि। किसी स्तरीय प्रशिक्षण संस्थान से डिप्लोमा/सर्टिफिकेट-धारक उम्मीदवार को नियुक्ति के अवसर मिलते है।
मेकअप सहायक - टीवी के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने वालों को सजाना सँवारना मेकअप सहायक का कार्यक्षेत्र है। इसके अतिरिक्त साउंड इंजीनियरिंग, प्रोडक्शन, वीडियोग्राफी से संबंधित कई तकनीशियनों तथा इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ती है। पेंटर,फ्लोर सहायक, ग्राफिक आर्टिस्ट, प्रापर्टी सहायक आदि की भी नियुक्ति की जाती है। इन सभी पदों के लिए तकनीकी योग्यता होनी चाहिए।
रेडियो लेखन
रेडियों के लिए लिखना अपने आप में अलग तरह का होता है। अलग तरह से अभिप्राय यह कि लेखक को हमेशा इस बात के प्रति चैकस रहना होता है कि वह कानों के लिए लिख रहा है इसलिए बात बहुत साफ-सुथरे ढंग से सरलतम शब्दों में कही जानी चाहिए। आंखो के लिए लिखते समय इतनी सावधानी की आवश्यकता नही होती क्यों कि यदि कोई क्लिष्ट या दुरूह बात लिखी भी जायेगी तो पाठक उसे दो-तीन बार पढ़ कर समझ लेगा। किंतु रेडियो से तो एक शब्द एक ही बार मिलेगा।
कई बार देखा गया है कि पत्र-पत्रिकाओं के लिए लंबे समय से लिखने वाला लेखक भी रेडियो लेखन की अपेक्षाएं पूरी नही कर पाता । उसका कारण भी यही होता है कि प्रकाशन के लिए लिखना और प्रसारण के लिए लिखना दोनों अलग बातें है।
रेडियों के लिए लिखते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए-
1. वाक्य जितने छोटे और सरल हों उतना अच्छा।
2. अधिक कठिन, अप्रचलित शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
3. उप वाक्यों को जोड़ने के लिए ‘व‘ और ‘तथा‘ के स्थान पर और का ही प्रयोग प्रचलित है।
4. रेडियों पर हर कार्यक्रम की समय सीमा निर्धारित होत है। इसलिए जितने समय का आलेख मांगा गया हां उतने समय में आ सके इतना ही विसतार दें। अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए।
5. यदि अपने ही क्षेत्र के प्रसारण के लिए कुछ लिखा जा रहा है तो उसमें क्षेत्रीय कहावतों, प्रचलित शब्दों का समावेश रचना को सुंदरता और सजीवता ही देगा।
रेडियों लेखन के सिद्धांत


रेडियों लेखन के सिद्धंात-
रेडियों लेखन के मूलभूत सिद्धंात निम्नलिखित हैं।
1. शब्द
रेडियों आलेख के लिए चुने गए शब्द ‘बोले‘ हुए प्रतीत हों। ‘लिखित‘ शब्दों और ‘बोले‘ हुए शब्दों में अंतर होता है। उपर्युक्त, उक्त निम्नलिखित, निम्नांकित ,अर्थात् जैसे शब्दों का लिखित महत्व हो सकता है। पर रेडियों की बोलचाल की भाषा में सहज शैली के बीच ये शब्द बेकार होते हैं। बेकार शब्द रेडियों की पढकथा के लिए घातक होते हैं। वक्ता को उतार-चढ़ाव या सुर, ताल, स्वर में विविधता भी लानी चाहिए।

 

2. ध्वनि -प्रभाव
रेडियों में ध्वनि-प्रभाव का अपना महत्व होता है। ध्वनियाँ ही दृश्य-चित्र के निर्माण में सहायक होती हैं। घोडे़े की टापों का ध्वनि -प्रभाव युद्ध क्षेत्र का कल्पना चित्र श्रोता के सम्मुख उत्पन्न कर सकता है। तो पक्षियों की चहक उगती भोर का दृश्य मानस-पटल पर खींच सकती है। उल्लू की चीखों से भयानक अंधेरी रातों का दृश्यबँध पैदा हो सकता है और बारिश की बंूदों की आवाजें मौसम के खुश नुमा दृश्य भी मन पर सकार कर सकती है। जिन बातों और दृश्यों को साकार करने मेें कोई वाक्यों और शब्दों का सहारा लेना पड़ता है उन्हें रेडियों कुछ ही ध्वनियों के रिकार्डो के माध्यम से सुगमता से प्रस्तुत कर सकने में समर्थ है। फेड-आउट (तेज से धीरे-धीरे मद्धिम ध्वनि) रेडियों के आधारभूत व्याकरण हैं। एक तरह से ये ‘उपकरण‘ हैं जो समय की कमी अथवा दृश्य-परिवर्तन को सूचित करने के लिए प्रयुक्त किए जाते है।ये ध्वनि-प्रभाव तीन प्रकार के होते हैं-
(क) क्रिया ध्वनि: दरवाजे की दस्तकं, जोर से चीजे पटकने, लाठी की ठक-ठक जैसी क्रियाओं की ध्वनियों का उपयोग भी रेडियों के पटकथाकार को करना होता है। चीजों का जोर से पटकना व्यक्ति के यदि बर्तन के पटकने की आवाजों का चित्र उपस्थित किया जाए तो वातावरण के तनाव को अहसास श्रोता सरलता से कर सकते हैं।
(ख) स्थल ध्वनियाँ- किसी खास वातावरण का बोध कराने वाली ध्वनियाँ कहलाती है। उदाहरणार्थः- गरम चाय की आवाजें, कुली-कुली की पुकारें, गाड़ियों के आने की उद्घोषणाएं आदि रेल्वे प्लेटफार्म की गहमा-गहमी का दृश्य साकार कर देती है। इनका उपयोग बैक ग्राउंड सेटिंग की तरह होता है।
(ग) प्रतीक ध्वनियाँ- नाटकीय स्थितियों के सृजन के लिए विशेष प्रतीकात्म ध्वनियों का उपयोग किया जाता है। हास्य नाटिकाओं के बीच ठहाकों युद्ध-स्थल पर विस्फोटात्मक ध्वनियों तथा रोमांटिक दुश्यों में झरनों की ध्वनियों और पक्षियों की चहचहाटों का उपयोग भी रेडियों आलेख को सशक्त बनाता है।
संगीत
रेडियों आलेखों में संगीत का संयोग नाटकीयता को उभारने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। वातावरण बनाने पात्र के भाव को उजागर करने और आलेख को गतिशील बनाने के लिए पटकथाकार संगीत का सहारा लेते हैं। मंद संगीत आरंभिक समापन करने वाला संगीत, दृश्य परिवर्तन की सूचना देने वाला संगीत, दृश्य परिवर्तन की सूचना देने वाला संगीत अनेक रूपों में आलेखकार के लिए उपलब्ध होता है। अतः आलेखकार को इनके उपयोग के निर्देश बराबर अपनी पटकथा में देने चाहिए।
(4) भाषा
रेडियों के आलेख की भाषा का किताबी भाषा से बहुत कम संबंध होता है। जिन शब्दों का अर्थ खोजने में श्रोता को जरा भी कठिनाई हो ये शब्द श्रोता की उलझन के कारण बन जाते हैं। रेडियों की भाषा सहज बोलचाल की भाषा है। उसमें दृश्य प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता होनी चाहिए। छपी हुई भाषा में आंकडों में लिखी जाने पर श्रोता के लिए उलझनकारी बन जाती है। उदाहरणार्थ “सोने के भाव 1970 से 1000 रू. प्रति 10 ग्राम से बढ़कर 1980 में 1500 रू. प्रति 10 ग्राम हो गया” के स्थान पर रेडियों के श्रोता के लिए यह भाषा उपयुक्त होगी। 1970 मे सोने के दाम 1000 रू प्रति 10 ग्राम थे पर अगले दस सालों में ही भाव डेढ गुने हो गए।
उदाहरणार्थ - उक्त, क्रमशः जैसे शब्द भी मुद्रित भाषा के लिए उपयोगी है। रेडियों के लिए नही। रेडियों की ध्वनियाँ भी श्रोता को बहुत देर तक बाँध नहीं सकती। इसलिए रेडियों आलेखोें में बहुत छोटे-छोटे और सरल वाक्यों का उपयोग होना चाहिए। हर वाक्य एक ही प्रकार के संदेश का वाहक हो तो श्रोता आसानी से बोली गई बात को ग्रहण कर सकता है। भारी-भरकम शब्दावली, व्यर्थ का आडंबर और उलझे हुए वाक्य रेडियों लेखन के लिए शत्रु है।
(5) रोचकता
रेडियो का श्रोता बात को दुबारा पूछ नहीं सकता, न दुबारा सुन सकता है। अतः उसके लिए यदि भाषा में कठिनाई अथवा जटिलता हुई तो उसकी संदेश में रूचि ही नष्ट हो जाती है। अतः अपने आलेख को आत्मीय रोचक और आकर्षक शैली में प्रस्तुत करना भी रेडियों के लिए लेखन करते समय आवश्यक है।
(6) संक्षिप्ता
रेडियो समयबद्ध प्रसारण है। इसलिए ‘थोड़े में बहुत‘ कह देना रेडियों आलेखकर की विशेषता है। पाँच मिनट की वार्ता में सारी जानकारी का विस्तृत विवरण नहीं दिया जा सकता। इसलिए अतिरोचक मुद्दों का चयन करके उसे समय की सीमा में बाँध देना ही पटकथाकार की कुशलता है। रेडियों नाटकों में भी न तो फालतू पात्र रखे जा सकते हैं और न ही फालतू संवाहीन लच्छेदार संवाद। कही हुई बातों की पुनरावृतियाँ भी रेडियों पटकथा की कमजोरियाँ बन जाती हैं।
(7) नवीनता
रेडियो पटकथा के लिए नवीनतम विषय, नवीनतम शैली, नवीनतम जानकारी अतिरिक्त गुण होती है। विविध और रोचक सामग्री यदि नवीन रूप में प्रस्तुत की जाए तो श्रोता समुदाय की रूचि का कारण बनती है। घिसी-पिटी बासी चीजें श्रोताओं को बहुत दिन तक नही बाँध पाती।
(8) श्रोता समुदाय की जानकारी-
रेडियो प्रसारणों में श्रोता समुदायों की जानकारी बहुत जरूरी है। अपना आलेख तैयार करते समय पटकथाकार को ज्ञात होना चाहिए कि वह किसी वर्ग के श्रोता को अपना संदेश देना चाहता है। बच्चों और किशोरों के लिए लिखे गए आलेख और रूप में प्रस्तुत किए जाएंगे तो महिलाओं के लिए लिखे गए आलेखों का रूप भिन्न होगा। कृषि और ग्रामीण कार्यक्रमों के लिए तैयार किये गए आलेखों का स्वरूप साहित्यिक प्रसारणों से अलग होगा। गंभीर वैज्ञानिक जानकारी भी यदि कृषि प्रधान कार्यक्रमों के लिए लिखी जा रही है तो उसे सहज बोलचाल की भाषा में प्रस्तुत करना होगा वरना श्रोता के लिए व्यर्थ ही होगी।
(9) मौन या निःशब्दता-
मौन भी रेडियों प्रसारण मे एक आश्चर्यजनक महत्तवपूर्ण तत्व है। मौन शब्दों पर जोर दे सकता है और श्रोता को इतना समय दे सकता है कि वह उन्हें ध्यान से सुनकर समझ सके और अपनी कल्पना शक्ति से उन्हं आत्मसात कर सके। लगातार एक ही तरह की ध्वनियों का प्रवाह निरसकता का सृष्टि करता है। मौन लय पैदा करने और समग्र ध्वनि -संरचना को संतुलित करने में सहायक होता है।
भारत में रेडियों का विकास - भारत में रेडियों प्रसारण 1927 ई. प्रारंभ हुआ जब मुबंई और कोलकाता में प्राइवेट ट्रंासमीटरों ने कार्य करना प्रारंभ किया था। 1930 ई. सरकार ने इसका संचालन अपने हाथ में ले लिया और इसका नाम इंडियन ब्राॅडकास्टिंग सर्विस रखा। 1936 ई. में नाम बदल गया। अब इंडियन ब्राॅडकास्टिंग सर्विस के स्थान पर इसका नाम ‘आॅल इंडिया रेडियों‘ रख दिया गया। 1957 ई. में आॅल इंडिया रेडियों को ‘आकाशवाणी जनता को मनोरंजन प्रदान करने के साथ-साथ उसे शिक्षित करने और जानकारी प्रदाने करने का महत्तवपूर्ण कार्य कर रहा है।

भारत में रेडियों का विकास - भारत में रेडियों प्रसारण 1927 ई. प्रारंभ हुआ जब मुबंई और कोलकाता में प्राइवेट ट्रंासमीटरों ने कार्य करना प्रारंभ किया था। 1930 ई. सरकार ने इसका संचालन अपने हाथ में ले लिया और इसका नाम इंडियन ब्राॅडकास्टिंग सर्विस रखा। 1936 ई. में नाम बदल गया। अब इंडियन ब्राॅडकास्टिंग सर्विस के स्थान पर इसका नाम ‘आॅल इंडिया रेडियों‘ रख दिया गया। 1957 ई. में आॅल इंडिया रेडियों को ‘आकाशवाणी जनता को मनोरंजन प्रदान करने के साथ-साथ उसे शिक्षित करने और जानकारी प्रदाने करने का महत्तवपूर्ण कार्य कर रहा है।


विविध कार्यक्रम एवं प्रभाग -
संगीत - भारतीय संगीत को जीवित रखने और उसके प्रति जनता की रूचि जागृत करने में आकाशवाणी का महत्तवपूर्ण योगदान है। भारतीय संगीत की विविध विधाओं- शास्त्रीय,सुगम, लोक तथा जनजातीय एवं पाश्चात्य संगीत के राष्ट्रीय कार्यक्रमों का प्रसारण प्रत्येक शनिवार को होता है। आकाशवाणी संगीत सम्मेलन के माध्यम से प्रतिवर्ष आकाशवाणी में आमंत्रित श्रोताओं के समक्ष संगीत के विशेष कार्यक्रम आयोजित करता है। नवोदित कलाकारों की संगीत विषयक रूचि को बढावा देने हेतु कर्नाटक और हिन्दुस्तानी दोनों के लिए क्षे़ीय स्तर पर आकाशवाणी संगीत सम्मेलन का आयोजन करता है। युवा प्रतिभाओं के लिए आकाशवाणी संगीत की प्रतियोगिताएं भी आयोजित कराता है। पुरस्कार प्राप्त कलाकारों को पेशेवर कलाकार के रूप में नियमित प्रसारण के अवसर भी प्रदान करता है। इस समय दिल्ली और चेन्नई मे आकाशवाणी वाद्य वृंद नाम से राष्ट्रीय आर्केस्ट्राका की इकाइयां कार्य कर रही है। जो अच्छे स्तर की संगीत रचनाएं प्रस्तुत कर रही है। इसके अतिरिक्त आकाशवाणी तीन प्रमुख संगीत समारोहों -त्यागराज, तानसेन और हरिदास संगीत समारोह को राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित करता है।
विविध भारती - विविध भारती आकाश वाणी का अत्यंत लोकप्रिय कार्यक्रम है। इस समय इसे आकाशवाणी के 45 केन्द्रों से प्रसारित किया जा रहा है। इनमें मुबंई दिल्ली, चेन्नई और गुवाहाटी सहित चार शार्ट वेब स्टेशन भी हैं। सप्ताह के सामान्य दिनों में एक तथा रविवार और अवकाश के दिनों में इस कार्यक्रम की कुल समय -सीमा 14 घंटे 15 मिनट होती है। इन कार्यक्रमों में मुख्यताः फिल्म संगीत, हास्य नाटिकाएं, लघु नाटक और कत्थक आदि ही प्रसारित किये जाते हैं।
विज्ञापन प्रसारण सेवा-1967 में प्रयोग के तौर पर मुबंई, पुर्ण और नागपुर से विज्ञापन प्रसारण सेवा प्रारंभ की गयी। बाद में इसका विस्तार 30 केन्द्रों तक कर दिया गया। इस सेवा के अंतर्गत 10,15,20 और 30 सेकेन्ड टेप किये हुए विज्ञापन किसी भी भाषा में स्वीकार किये जाते हैं। राष्ट्रीय समाचारों के प्रसारण से पहले ओर बाद मे सीमित आधार पर प्राइमरी चैनल (फेज-1) से 26 जनवरी 1985 में प्रायोजित कार्यक्रम आरंभ किए गये। इस समय प्राइमरी चैनल (फेज-2) पर 55 केन्द्रों से विज्ञापन सेवा की भी शुरूआत 26 जनवरी 1985 में हुई प्राइमरी चैनल (2) पर विज्ञापन प्रसाति कने वाले केन्द्रों की संख्या वर्तमन में 71 है। वर्ष 2004-05 में आकाशवाणी को विविध भारती और प्राइमरी चैनल पर प्रसारित विज्ञापनों से 105 करोड़ रूपयें की आमदनी हुई।

नाटक - आकाशवाणी पर प्रसारित रेडियों नाटक अत्यंत सशक्त एवं लोकप्रिय विधा रही है। करीब 80 केन्द्र अपने-अपने क्षेत्र की भाषाओं और बोलियों में नाटक प्रसारित करते हैं। प्रत्येक रविवार को नाटकों का राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है। विभिन्न केन्द्रों से क्षेत्रीय भाषाओं में प्राप्त महत्वपूर्ण नाटकों का चुनाव कर उन्हे हिंदी में अनुवादित किया जाता है। अहिंदी भाषी क्षेत्रों के केन्द्र इसका क्षेत्रीय भाषा में तत्काल अनुवाद प्रसारित करतें है। हर महीने एक आदर्श नाटक तैयार कर 30 से अधिक क्षेत्रों के केन्द्रों को भेजा जाता है। रेडियों नाटकों के साथ-साथ अन्य भाषाओं की चर्चित कहानियों, थियेटर नाटक, उपन्यासों आदि के रूपान्तरण भी प्रसारित किये जाते है। 1987 से प्रमुख भारतीय भाषाओं में अखिल भारतीय नाटक प्रतियोगिता का आयोजन नई प्रतिभाओं की तलाश करने और उन्हें रेडियों नाटक लिखने के लिए प्रेरित करने के लिए किया जाता है।
समाचार और सामयिक - रेडियों पर देश मे पहला समचार बुलेटिन 23 जुलाई 1927 को मुबंई से एक निजी रेडियों स्टेशन से प्रसारित किया गया। आकाशवाणी में समाचार कक्ष की शुरूआत 1937 में हुई, जहंा से प्रथम बार समाचार बुलेटिन दिल्ली से प्रसारित हुआ।
1939-40 तक आकाशवाणी से 27 समाचार बुलेटिन प्रसारित होने लगे थे। इसके समाचार संगठन को केन्द्रिय समाचार संगठन का नाम दिया गया। बाद में इसको बदलकर समाचार सेवा प्रभाग कहा जाने लगा। समाचार सेवा प्रभाग की यह सेवा 97 प्रतिशत जनता को उपलब्ध हैं। वर्तमान समय में रोजाना 288 समाचार बुलेटिन प्रसारित किये जाते है। जिनकी कुल प्रसारण अवधि 38 घंटे 51 मिनट है। इनमें से 89 समाचार देश के लिए हैं। 41 क्षेत्रीय समाचार एकांशों से 17 घंटे 51 मिनट की अवधि के 134 समचार बुलेटिन प्रसारित होते हैं विदेश सेवा के अंतर्गत 8 घंटे 55 मिनट की कुल अवधि के 65 समाचार बुलेटिनों का प्रसारण किया जाता है। 28 मई 1995 से समाचार सेवा प्रभाग में एफ.एम. चैनल पर भी समाचारों का प्रसारण आरंभ कर दिया है। समाचार सेवा प्रभाग के कार्यक्रम में समाचार बुलेटिन के अतिरिक्त समीक्षाएं चर्चाएं अखबारों की समीक्षा, न्यूजरील, खेल तथा अन्य सामयिक विषयों के कार्यक्रम भी शामिल होते है। 15 अगस्त 1993 से अंग्रेजो में जनरल न्यूज पूल की तरह ही हिंदी समाचार पूल की स्थापना की गई। 2 अक्टूबर 1991 से एक बजे से सवेरे पंाच बजे तक हर घंटे ही अब आकाशवाणी से चैबीसों घंटे समाचारों का प्रसारण होने लगा है। इन समाचारों में खेल, युवा तथा धीमी गति के समाचार मुख्य हैं जिनका विशेष समाचार बुलेटिन प्रसारित होता है। हज के समय यात्रियों के लिए पंाच मिनट का विशेष समाचार बुलेटिन जारी किया जाता है।
संसद के अधिवेशन के समय रोजना हिंदी में लोकसभा तथा राज्यसभा की कार्यवाही की समीक्षा प्रसारित की जाती है। विधान मंडलों की कार्यवाही की समीक्षा के प्रसारण का कार्य 41 क्षेत्रीय इकाइयां करती है। जो राज्य विशेष से सम्बद्ध होती है। 16 अगस्त, 1994 को आकाशवाणी के सिलचर केन्द्र ने सुबह पंाच मिनट के समाचार बुलेटिन प्रसारित करना आरंभ किया है। आकाशवाणी अगरतला ने भी बंगला में ही पंाच मिनट का समाचार बुलेटिन 12 अक्टुम्बर 1994 को शुरू किया है।
आकाशवाणी के समाचार संकलन का मुख्य दायित्व उसके संवाददाताओं पर हैं। कुल 108 संवाददाताओं में से 101 देश में तथा 7 विदेश में है। इसके अतिरिक्त 246 अंशकालिक संवादाताओं के अतिरिक्त आकाशवाणी यू.एन.आई.

Share |