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साधौ ये मुर्दों का गांव

पालना बंद करें अलगाववादियों को

पालना बंद करें अलगाववादियों को
जम्मू कश्मीर इस धरती पर जन्नत है। कुदरत ने भी इस प्रदेश को भरपूर नैसर्गिक प्यार दिया है, हर तरफ प्राकृतिक सुंदरता बिखरी पड़ी है। धरती के इस स्वर्ग पर शायद ही कभी शांति देखने को मिली हो। यहां देश संवैधानिक रूप से इतने कमजोर और मजबूर है कि हाथ बांधे तमाशा देखता रहता है। बमुश्किल यहां राजनीतिक स्थिरता आई थी लेकिन यहां सरकार में बैठने वालों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, कभी लाख चाहें फिर भी इनके सुर भारत विरोधी ही होते हैं। यहां अलगाववादी इतने ताकतवर हो चुके हैं कि वह जब चाहे सरकार को आंखें दिखाते हैं। समझ से परे हैं कि सरकार आखिर अलगाववादी नेताओं को प्रश्रय क्यों दे रही है जबकि यह सरकार को जूते की नोक पर रखते है। इनकी सुरक्षा पर करोड़ो खर्च हो रहे हैं इनको तमाम शासकीय सुविधाएं मुहैया हैं। आखिर क्यों, ये भी तो आतंकवादियों का दूसरा चेहरा ही हैं, घोषित न सही पर हैं तो यह भी आतंकवादी। सरकार को इनके बारे में कड़ा फैसला लेना चाहिए और कश्मीर घाटी से इनको खदेड़ देना चाहिए, क्योंकि यह कश्मीर में ही सुरक्षित हैं और यहीं भारत को गालियां दे सकते हैं। देश के किसी और प्रदेश में जाकर इनका मुंह खुला तो हश्र क्या होगा यह जानते हैं। हाल ही में यहां अलगाववादी नेताओं ने जिस तरह से हमारे कश्मीर में आइए, स्वागत है, बयान दिया इससे इनके दिल में छुपी शैतानियत साफ दिखाई देती है। इन्हीं में नेशनल कांफ्रेस के अध्यक्ष फारूख अब्दुल्ला भी हैं जो कश्मीर की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं। आज तक कश्मीर की राजनीति पर ही फारूख पलते रहे हैं। उनके ताजा बयान से साफ हो गया है कि उनकी पार्टी भी कश्मीर में उपद्रवियों को शह देने में जुटी हुई थी। जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ्ती ने नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूख अब्दुल्ला के कश्मीर की स्वतंत्रता के समर्थन वाले बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। महबूबा ने कहा, 'पिछले कुछ महीनों से घाटी में अशांति दौरान वाहनों पर पत्थर फेंकने, स्कूलों में आगजनी और सुरक्षा बलों के शिविरों पर हमले हो रहे थे। उन्होंने कहा कि कश्मीर की आजादी की लड़ाई के लिए अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रेंस का समर्थन करने की शपथ लेकर फारूख ने इन महीनों में इस तरह की गतिविधियों में अपनी पार्टी के शामिल होने की पुष्टि कर दी है। अब घाटी के हालात धीरे धीरे पटरी पर आने लगे हैं तो अलगवादियों को अपनी चिंता सताने लगी है वह फिर से सक्रिय होकर समर्थकों को उपद्रव करने के लिए उकसा रहे हैं। नोटबंदी के बाद बिगड़े हालातों में अब बैंकों को लूटने की घटनाएं हो रही हैं। यह अलगाववादियों के सक्रिय होने का प्रमाण है। केंद्र सरकार को अब बिना देरी किए इन अलगाववादी नेताओ के मुंह पर लगाम लगाना चाहिए। या तो सेना को इनसे निपटने की इजाजत दी जाए या फिर संवैधानिक रूप से कठोर फैसला लेकर कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किया जाए। प्रधानमंत्री मोदी जब नोटबंदी का इतना बड़ा फैसला लेने की हिम्मत कर सकते हैं तो फिर कश्मीर को भी आम राज्य बना दें। कश्मीर का मसला अब और अधिक वर्षों तक खींचने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि अकेले इस राज्य के कारण ही देश का सैन्य बल और सुरक्षा पर ही बजट का अधिकांश हिस्सा खर्च हो जाता है। कश्मीर का विकास भी थमा हुआ है, यह भारत का हिस्सा है लेकिन यहां रहने वाले लोग भारतीयता को स्वीकार नही कर रहे ऐसे में कठोरतम निर्णय की दरकार है।

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