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साधौ ये मुर्दों का गांव

ऐसे ही नहीं बन गई अम्मां

ऐसे ही नहीं बन गई अम्मां
वैसे तो कई फिल्मी सितारों ने राजनीति में किस्मत आजमाई लेकिन बहुत कम ऐसे हैं जो सफल हुए और किसी मुकाम तक पहुंचे। जयललिता ने फिल्म और राजनीति में अपना दबदबा बनाए रखा। इंदिरा गांधी के बाद वह पहली महिला नेता थीं जिनके आगे किसी का जोर नही चलता था। उन्होंने जो चाहा जैसा चाहा वैसा किया और जिसने रोड़े अटकाए उसे निर्दयता के साथ बाहर कर दिया। अपने फैसलों के आगे कभी किसी की न सुनने वाली इस नेता ने राजनीति में आने के बाद तमिलनाडू की तश्वीर ही बदल दी। सामाजिक सरोकार से सरकार को ऐसा जोड़ा कि वह एक छत्र राज करने लगीं। 1948 में मैसूर में एक तमिल परिवार में जन्मी जयललिता की जिंदगी जितनी दिलचस्प और सतरंगी रही, उससे कहीं अधिक नाटकीय मोड़ जयललिता के राजनैतिक जीवन में भी आए। पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर जयललिता ने कहा था कि वह खुद जिंदगी को अभिनय का रंगमच मानकर चलती है और राजनीति में भी कई भूमका निभाने को तैयार है। जयललिता ने सबसे पहले अंग्रेजी डाक्यूमेट्री फिल्म एपिस्टल में काम किया था जिसे उस समय के राष्ट्रपति वी वी गिरि के बेटे शंकर गिरि ने बनाया था। पर्दे पर एमजीआर के साथ अभिनय में साथ निभाते हुए उन्होंने एमजीआर की राजनीति में भी दिलचस्पी शुरू कर दी और फिर 1984 में राज्यसभा के लिए चुनी गई। 1987 में एमजीआर की मृत्यु के बाद एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन से लड़कर अपनी पहचान बनाई और 1989 में विधानसभा चुनाव के बाद विपक्ष के नेता के तौर पर सदन में बैठने वाली वह तमिलनाडु की पहली महिला थी। यहीं से जयललिता को अम्मा की मान्यता मिली। पीछे मुड़कर देखें तो 1967 से एआईएडीएमके और डीएमके के बीच सत्ता की अदला बदली जारी थी। इस 50 साल पुरानी परपंरा को जयललिता पिछले 16 मई को विधानसभा चुनाव में दूसरी बार जीतकर बदला था। सत्ता में आने के बाद जयललिता ने ब्रांड अम्मा के नाम से सब्सिडी योजनाओं की झड़ी लगा दी थी। अम्मा ब्रांड की सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं से उन्होंने तमिलनाडु का चेहरा ही बदल डाला और लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गर्इं। दनकी अपनी सरकार और संगठन पर पूरी पकड़ थी। जनता से सीधा संपर्क उनकी ताकत थी। मंत्रियों और अफसरों का दबाव तो उन पर कभी चला ही नहीं। सरकार और संगठन को उन्होंने जैसा चाहा चलाया था। अम्मा ने जो कह दिया वह पत्थर की लकीर की तरह हो गया। अम्मा के तीन शब्द यू डोन्ट नो यानि तुम नहीं जानते, इसके बाद न किसी को बोलने की अनुमति थी और न ही किसी की हिम्मत। जयललिता को 'ना' सुनने की जैसे आदत ही नहीं थी। जैसे इंदिरा गांधी के लिए कहा जाता था, ठीक वैसे ही जयललिता को भी 'अपनी कैबिनेट का इकलौता मर्द' कहा जाता था। जयललिता को राजनीति में अपनी जडेÞं जमाने के लिए पुरूष सत्ता और उच्च वर्ग के प्रभुत्व के खिलाफ जंग लड़नी पड़ी। जयललिता कोई कट्टर नारीवादी नहीं थी लेकिन उनमे वह माद्दा था कि जिस पर नारीवादी आंदोलन को नाज हो सकता है। उन्होंने इस समाज में औरतों के लिए तय हदों को तोडा था और अपना वजूद बनाया था। जयललिता ने भव्य जिंदगी जीने की आदी रहने के बावजूद गरीबों की अम्मा की छवि बनाने में सफल रही। यह जयललिता ही थीं जो अपनी छवि को गढ़ने में सफल रहीं और इसी कारण मोदी की लहर होने के बावजूद 2014 के चुनाव में 39 में से 37 सीटें जीतकर अपना लोहा मनवाने में कामयाब रहीं। 
श्रध्दांजलि।

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