Powered By डॉ.राहुल रंजन
साधौ ये मुर्दों का गांव

बिना नकदी कैसा बटुआ

बिना नकदी कैसा बटुआ
जेब में पर्स हो तो फिर उसमें नकदी भी रहना चाहिए, बिना नोटों के बटुआ कैसा। भारतीय समाज में तो बटुए में नकदी लेकर चलने की आदत रही है और यह आदत इतनी आसानी नहीं छूटने वाली, लेकिन प्रधानमंत्री जी चाह रहे हैं कि लोग बटुए में सिर्फ प्लास्टिक नोट लेकर ही चलें यानि एटीएम, डेबिट कार्ड इत्यादी। मानते हैं कि यह व्यवस्था ठीक है और सुरक्षित भी है लेकिन उतनी सुरक्षित भी नहीं जितनी समझी जा रही है। इस कैशलेश व्यवस्था के फायदे हैं तो जोखिम भी हैं, अभी सरकार सिर्फ नोटबंदी से मची अफरा तरफी की स्थिति से निपटने में व्यस्त है, इस बीच मौका देख विदेशी कंपनियां कैशलेश व्यवस्था में पैठ जमाने लगी हैं। ये कंपनियां बड़े विज्ञापनों के माध्यम से लोगों को आकर्षित कर रही हैं और लोग भी इनके माध्यम से खरीद बिक्री करते दिखाई दे रहे हैं। इन कंपनियों ने करोड़ों अरबों का कैशलेश व्यापार कर लिया है, अभी तक इन कंपनियों की वैधता के बारे में सरकार ने किसी तरह की पड़ताल नहीं की है। ये विदेशी कंपनियां किस तरह से कामकाज कर रही हैं कितना ब्याज ले रही हैं और उपभोक्ता के साथ धोखा होने पर जबाबदारी किसकी होगी कोई नहीं पूछ रहा। देश का कानून अभी ऐसी कंपनियों को दबोच नहीं रहा लेकिन जिस दिन लाखों करोड़ों लोग बर्बाद हो जायेंगे उस दिन होश आयेगा सरकार को। चूंकि नोटबंदी को लेकर जिस तरह की तरह की प्लान सरकार ने बनाया था और जैसा सोचा था, ठीक उसके विपरीत हुआ। सरकार को उम्मीद थी कि नोटबंदी के कदम से कालाधन बाहर निकल आयेगा और भ्रष्टाचार पर अंकुश लग जायेगा, साथ ही आतंकवाद की कमर टूट जायेगी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। बैकों में अनुमान से अधिक पैसा आ गया, और यह पैसा कालाधन नहीं है इसलिए सरकार को पसीना आ गया। सरकार कैशलेश समाज की बात कर रही है, तो उसे यह समझना चाहिए कि सरकारी कामकाज बटुए की नकदी से ही होता आया है यह प्लास्टिक नोट से नहीं होगा। सरकारी मुलाजिमों को नकदी के बिना किसी काम को करने की आदत नहीं है इसके बिना फाइलें आगे नहीं बढ़ेगी। सरकार को प्रशासनिक अमले को टाइट करना होगा और उसकी आदत सुधारनी होगी कि वह बिना लिए दिए काम करे। नोटबंदी के बाद जो दृश्य सामने दिखाई दे रहे हैं उसने सारे अनुमानों की धज्जियां उड़ा दी हैं। गौर करें 500 और 1000 रुपए के नोटों के कुल 15.44 लाख करोड़ रुपए प्रचलन में थे। उनमें से तकरीबन 11 लाख करोड़ रुपयों का हिसाब-किताब मिल चुका है। जबकि पुराने नोट जमा कराने के लिए अभी तकरीबन एक महीना बाकी है। अनुमान है कि कम-से-कम 95 फीसदी पुराने नोट लौट जाएंगे। इस तरह ये अंदाजा निराधार साबित होगा कि 3 से 5 लाख करोड़ रुपए का काला धन लोगों ने दबा रखा था। बहरहाल, न्यूनतम नकदी को प्रचलन में लाने के संदर्भ में ऐसी बातें बेमतलब हैं। ऐसा नहीं है कि यह विचार सरकार ने बाद में सामने रखा। प्रधानमंत्री लोगों से आह्वान कर चुके हैं- 'आप सिर्फ एक काम करें। आज यह संकल्प लें कि आप स्वयं कैशलेस सोसायटी (नकदीमुक्त समाज) का हिस्सा बनेंगे। यानी नकदी की जगह आॅनलाइन बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, प्लास्टिक मनी, ई-कॉमर्स आदि का उपयोग बढ़ाना प्रधानमंत्री की सोच का हिस्सा है। पर अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह तीव्र गति इंटरनेट और एटीएम मशीनों का जाल फैलाए, ताकि लोग निर्बाध ढंग से लेन-देन के नवीनतम तरीके अपना सकें। इस व्यवस्था को सुरक्षित बनाने के लिए बहुत कुछ करना होगा क्योंकि साइबर क्राइम के मामले में अभी हमारी पकड़ मजबूत नहीं है।

Share |