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बिना शिक्षक चल रहे स्कूल

बिना शिक्षक चल रहे स्कूल
मध्यप्रदेश के लिए एक और गर्व करने वाली रिपार्ट सामने आई है, यह रिपोर्ट संसद में पेश की हुई है, जिसके अनुसार मप्र में 4 हजार 837 स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं यानि यहां बिना शिक्षकों के ही बच्चे पढ़ रहे हैं। इस रिपोर्ट पर केंद सरकार का मानव संसाधन मंत्रालय हैरान है और उसने तत्काल शिक्षकों की भर्ती करने का फरमान जारी कर दिया है। ताज्जुब की बात है कि मामला सामने आते ही प्रदेश के शिक्षा मंत्री ने शिक्षकों की शीघ्र भर्ती करने की घोषणा कर दी है पर शायद मंत्री जी ने पुरानी फाइलों को देखा ही नहीं है। प्रदेश में शिक्षकों की भर्ती का मामला तो 2013 से चल रहा है, तब 36 हजार शिक्षकों की भर्ती करने की घोषणा की गई थी। पर नियम कायदे बनते बनते इतना वक्त गुजर गया कि अक्टूबर 2016 में भर्तियों को लेकर कैबिनेट में संक्षेपिका रखी गई तब से अब तक इसका अध्ययन लोक शिक्षण संचालनालय में हो रहा है। मतलब 2013 से सरकार शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया के नियम कायदे तक नहीं बना पाई है तो क्या यह संभव है कि नए शिक्षण सत्र के शुरू होने से पहले इन पदों को भर दिया जाएगा। क्योंकि अब पीईबी पर भरोसा नहीं रहा। अभी तक तो सरकार जुगाड कर अपना दामन बचा रही थी लेकिन सच्चाई सामने आने के बाद केंद्र के सामने किरकिरी हो गई है। वैसे केंद्रीय मानव संसाधन विभाग ने यूनिफाइड डिस्ट्रिक्स इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) के तहत जुटाई गई जानकारी का यह एक पक्ष है। आरटीआई मापदंडों के मुताबिक प्रदेश के 1.23 लाख सरकारी स्कूलों में 47 हजार शिक्षकों की कमी है। इसमें 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान है। कमी होने से अंग्रेजी, गणित आदि विषयों का रिजल्ट खराब हो रहा है। तीन सालों में संविदा शिक्षकों की भर्ती न होने के बीच रिक्त पदों की संख्या 36 से बढ़कर 41 हजार हो गई। वर्ष 2013 में स्कूल शिक्षा विभाग ने 36 हजार शिक्षकों की भर्ती का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा था। वित्त ने सरकार की आर्थिक स्थिति का हवाला देकर सिर्फ 18 हजार शिक्षकों की भर्ती की सलाह दी थी। 2016 में फिर से प्रस्ताव तैयार हुआ, तब तक 41 हजार से ज्यादा पद खाली हो गए। सरकार की लेतलाली का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि एक एक विभाग नियम कायदों की फाइलों को साल भर में भी देख पढ़ नहीं पा रहा है। इधर मुख्यमंत्री कई बार शिक्षकों की भर्ती करने की बात कह चुके हैं तो क्या उन्हें अधिकारियों ने मामले से अवगत नहीं कराया या फिर मुख्यमंत्री ने ही इस मामले में रुचि नहीं ली और इसे आगामी चुनाव तक लटकाए रखने का मन बना चुके हैं। यह तो तय है कि अभी शिक्षकों की भर्ती का काम इतनी जल्दी नहीं होने वाला। न ही स्कूलों की दशा सुधरने वाली है। पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार देश में बगैर शिक्षकों के संचालित हो रहे सरकारी स्कूलों में ज्यादातर स्कूल प्राथमिक स्तर के हैं। तेलंगाना के 1944 , आंध्रप्रदेश के 1339, छत्तीसगढ़ के 385 और उत्तरप्रदेश के 393 स्कूलों की ऐसी ही स्थिति है। मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने संसद में लिखित में कहा है कि राज्यों को बार-बार पद भरने को कहा गया, लेकिन अब भी स्थिति चिंताजनक है। मप्र में लगातार बढ़ रही संख्यारिपोर्ट के मुताबिक मप्र में ऐसे स्कूलों की संख्या पिछले कई सालों से लगातार बढ़ रही है। इससे साफ है कि राज्य सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षकों के 19.48 लाख पद सृजित किए गए हैं, लेकिन 31 मार्च 2016 की स्थिति में 15.74 लाख शिक्षकों के ही पद भरे जा सके हैं। ऐसे में अभी भी करीब 3.74 लाख शिक्षकों के पद भरे जाने है। शिक्षकों को लेकर की जा रही राजनीति भी भर्ती में बहुत बड़ा रोड़ा है। हर राज्य में भर्ती की अलग अलग व्यवस्थाएं हैं लेकिन सब पर राजनीति दबाव हावी है जो कि भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी नहीं रहने देता। हालांकि केंद्र के हस्तक्षेप का मामला नहीं है लेकिन लगता है कि इस मामले में भी केंद्र ही नकेल कसेगा तब जाकर स्थिति सुधरेगी।

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