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साधौ ये मुर्दों का गांव

संसद तक सिमटा विपक्ष

संसद तक सिमटा विपक्ष
लगता है कि अब वह जमाना नहीं रहा जब विपक्षी दलों की बात को महत्व दिया जाए। विपक्ष अब सड़कों पर ताकतवर नहीं रहा वह सिर्फ संसद तक सीमित है, वहां शोर शराबा, हंगामा कर कार्यवाही को रोकने में सफल हो सकता है लेकिन उसकी बात को आम लोगों ने वजन देना बंद कर दिया है यहां तक कि विपक्षी दलों के कार्यकर्ता भी अपने ही नेताओं की बातों से सहमत होते दिखाई नहीं दे रहे हैं। विपक्ष की ऐसी हालत पहले कभी नहीं देखी थी, एक समय था जब सरकार को विपक्ष की बातों के आगे कई बार झुकना पड़ता था और कई फैसले बदलने पड़ते थे। देश में कांग्रेस से बड़ा कोई दल नहीं, पर आज वह विपक्ष की भूमिका निभाने में सफल नहीं हो पा रहा है, उसे विपक्ष में रहने का व्यवहारिक ज्ञान नहीं है, वह सत्ता का आदी हो चुका है। अन्य दलों की भी हालत ऐसी ही दिखाई दे रही है हालांकि केंद्र में इन दलों की सहयोगी की ही भूमिका रही है पर इनमें भी दंभ बरकरार है। बीते ढ़ाई साल में भाजपा ने सत्ता में आने के बाद से प्रधानमंत्री ने जिस तरह की राजनीति की है उसने विपक्ष को खत्म सा कर दिया है। इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि नोटबंदी के मामले पर कांग्रेस और तमाम दल सड़क पर उतरे, चाह तो रहे थे कि आम जनता नोटबंदी के मुद्दे पर उनका समर्थन करे और भारत बंद सफल हो जाए लेकिन इस बार जनता उनके झांसे में नहीं आई, चूंकि फैसले का तमाम परेशानियों के बाद भी जनता ने स्वागत किया है। फिर भी विपक्ष देश भर में सड़कों पर उतरा और बंद की जगह आक्रोश व्यक्त कर अपने हाथ से फिसलती रेत को देखता रहा। कुछ राज्यों बिहार, केरल, त्रिपुरा और ओडिशा जैसे राज्यों में तकरीबन बंद जैसा माहौल दिखा। आक्रोश रैली में कांग्रेस के अलावा तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, लेफ्ट पार्टियां, डीएमके व अन्य स्थानीय दल शामिल थे। लेकिन इस सूची में जेडीयू जैसे उग्र मोदी विरोधी दल का न होना किसी सरप्राइज जैसा है। वैसे तो जेडीयू नेता और बिहार के सीएम नीतीश कुमार शुरू से ही नोटबंदी के पक्ष में रहे हैं, लेकिन वे विपक्ष के साझा अभियान से भी बिल्कुल अलग रहेंगे, यह शायद ही किसी ने सोचा हो। संभव है, बिहार की सियासत के अंदरूनी दबाव के कारण उन्हें यह दिशा पकड़नी पड़ी हो। पिछले ढाई-तीन वर्षों से वे मोदी विरोध का प्रतिनिधि चेहरा बने हुए हैं। विपक्ष की पांत में उनकी अनुपस्थिति से सरकार को जरूर कुछ राहत मिली होगी। विपक्षी दलों में एक तरफ आपसी समझदारी की कमी दिख रही है, दूसरी तरफ अपने स्टैंड को लेकर भी उनमें असमंजस है। केजरीवाल, ममता और मायावती नोटबंदी के सख्त खिलाफ हैं, वह फैसला वापस लेने की मांग कर रहे हैं जबकि समाजवादी पार्टी इससे आम जनता को होने वाली तकलीफ को देखते हुए इसमें ढील देने की मांग कर रही है। आम आदमी पार्टी का सुर तो अलग ही चल रहा है, उसकी बात को जनता ने नकार दिया है। जनता असमंजस में है, जबकि सत्ता पक्ष का रवैया कुछ ज्यादा ही आक्रामक है। नोटबंदी के पर हालांकि अभी तक स्थिति साफ नहीं है कालेधन को लेकर संशय बरकरार है पर आम आदमी इसके अर्थशास्त्र में उलझना नहीं चाहता, वह निर्णय पर खुश है उसे लग रहा है कि इससे बड़े लोगों पर करारी मार पड़ी है। वह इससे भी खुश है कि नेताओं और राजनीतिक दलों के पास दबा कालाधन अब बेकार हो गया है इसलिए चीख चिल्ला रहा है।

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