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साधौ ये मुर्दों का गांव

राजनीतिक दलों पर नकेल

राजनीतिक दलों पर नकेल
आखिर नोटबंदी से आमजनता ही क्यों परेशान हो, उसे ही क्यों कर तरह की परेशानियां झेलना पडेंÞ, देश के विकास में उनकी आहुति यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मांग रहे हैं तो फिर राजनीतिक दलों को छूटें क्यों दी जाएं। यह तो कोई बात नहीं कि राजनीतिक दलों को वह तमाम सुविधाएं दी जाएं जिनका लाभ वह निजी तौर पर उठा रहे हैं, वह चंदा उगाही करें, जमकर खर्चा करें और चैन की काटें, कोई पूछने वाला नहीं, उन्हें न किसी तरह का आय व्यय का ब्यौरा देना होता है और न ही उनके ऊपर इनकम टैक्स विभाग की गाज गिरती है। राजनीतिक दलों को मिली इस तरह की छूटों के कारण ही कालेधन को जमा करने का मौका मिला। देश यदि कानून से चल रहा है तो फिर कानूनों में एकरूपता होनी चाहिए, आम आदमी और नेताओं के साथ अलग अलग कानून के तहत कार्रवाई तर्कसंगत नहीं हैं। इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था में पक्षपात की बू आती है और पारदर्शी शासन पर संदेह उत्पन्न होता है। चुनाव आयोग ने लगभग दो सौ राजनीतिक दलों के पंजीयन निरस्त करने का सुझाव दिया है आयोग का कहना है कि ये ऐसे राजनीतिक दल हैं जो कभी चुनाव नहीं लड़ते, इनका अस्तित्व भी शेष नहीं है लेकिन यह सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। ताज्जुब की कोई बात नहीं कि देश में ऐसे भी राजनीतिक दल हैं जो राष्ट्रीय दल के रूप में पंजीकृत हैं लेकिन इनका देश के किसी भी राज्य में वजूद नहीं है, बावजूद इसके कि इन्हें व्यवस्था से बाहर कर दिया जाए इन दलों के प्रमुखों के सामने सरकारें हमेशा झुकती रही हैं। लेकिन नोटबंदी के फैसले के बाद चुनाव आयोग भी सक्रिय हो गया है और उसने चुनाव प्रक्रिया सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिए हैं यदि प्रधानमंत्री मोदी आयोग के प्रस्तावों का समर्थन करते हैं तो देश में स्वस्थ राजनीति का वातावरण बनाने की दिशा में बहुत बड़ा कदम होगा। एक स्वर से कहा जा रहा है कि चुनाव सुधार के बगैर ब्लैक मनी और करप्शन की समस्या से निपटा नहीं जा सकता क्योंकि चुनाव कालेधन को खपाने का एक प्रमुख जरिया बने हुए हैं।देश के लोगों की आकांक्षा को देखते हुए चुनाव आयोग ने इस संबंध में सार्थक पहल की है। उसने राजनीतिक दलों के चंदे को पारदर्शी बनाने के लिए केंद्र सरकार से मांग की है कि जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन करके दो हजार रुपये से अधिक के चंदों के स्रोत बताना अनिवार्य किया जाना चाहिए। फिलहाल यह सीमा 20 हजार रुपये है। आयोग की यह भी मांग है कि आयकर में छूट उन्हीं दलों को मिलनी चाहिए, जो चुनावों में नियमित रूप से हिस्सेदारी करते हैं। आयोग ऐसे 200 से अधिक दलों के वित्तीय मामलों की जांच के लिए आयकर अधिकारियों को पत्र लिखने वाला है, जिन्हें उसने चुनाव न लड़ने के कारण सूची से बाहर किया है। भले ही आयोग को शक हो कि ये कालेधन को सफेद करने का काम करते हैं लेकिन यह सर्वविदित है। सरकार ने इस मांग को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया है पर क्या उसमें इतना साहस है कि वह राजनीतिक दलों को चंदे में मिलने वाली छूट को पूरी तरह समाप्त कर दे? अगर वह वाकई ब्लैक मनी के खिलाफ अभूतपूर्व कदम उठाना चाहती है तो वह तत्काल ऐसा करे। राजनीतिक पार्टियों को 20 हजार रुपये की भी छूट क्यों मिलनी चाहिए? बेहतर तो यह होगा कि वे एक-एक पैसे का हिसाब दें ताकि शक की कोई गुंजाइश ही न बचे।

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