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नोटबंदी: बार बार नियम बदलने से संदेह

नोटबंदी: बार बार नियम बदलने से संदेह
नोटबंदी को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार बेहद खुश है, वह इसे देश के भविष्य से जोड़कर देख रहे हैं और देश को एक ऐसी व्यवस्था की ओर ले जाना चाहते हैं जहां बटुए में नोट न रखना पड़े। चूंकि सरकार बहुमत में है और विपक्ष कमजोर तथा आम जनता असहाय, इसलिए यहां सरकार की मर्जी ही सब कुछ हो गई है, फिलहाल तो ऐसा दिखाई दे रहा है कि सरकार अपने इस फैसले को जिसे वह जनता पर थोप कर उलझती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री ने जिस तरह से कहा था कि पचास दिन के बाद सब कुछ सामान्य हो जायेगा लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है, परेशानियां अब भी जस की तस बनी हुई हैं, बैंकों द्वारा अपने ही उपभोक्ता के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। वहीं लगातार छापों में मिलने वाले नए , पुराने नोटों के ढ़ेरों ने संदेह को जन्म दिया है कि कहीं कालेधन को निपटाने के लिए किया गया यह निर्णय कालेधन को पहले से ही सफेद करने के लिए तो नहीं था। संदेह और भी हैं प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं उन्होंने रिजर्व बैंक द्वारा बार बार बदले जा रहे नियमों पर संदेह जताया है। वैसे तो नोटबंदी को लेकर आम आदमी का सरकार को समर्थन है वह परेशानियों को झेलने को भी तैयार है लेकिन फिलहाल जिस तरह से नोट जमा कराने के लिए बार बार नियम बदले जा रहे हैं उससे संदेह हो रहा है कि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। जनता असमंजस में है, वित्तमंत्री अरुण जेटली पुराने नोटों को जमा कराने के लिए नए नियमों के साथ अवतरित हुए और कुछ घंटों बाद ही नए संशोधन लेकर सामने आ गए। हो क्या रहा है यह समझ से परे है, हालात यह हैं कि बैकों तक उपभोक्ताओं के पहुंचने के बीच ही नियम बदले जा रहे हैं। इससे यह धारणा मजबूत हो रही कि नोटबंदी का फैसला लेते समय सरकार ने उससे जुड़े सभी आयामों पर समग्रता से विचार नहीं किया, यह तो गनीमत है कि देश की जनता ने इस मामले में धर्य रखा अन्यथा अब तक न जाने क्या क्या हो चुका होता। असंतोष इसे लागू करने के तरीके पर था जो अभी तक बरकरार है और सरकार इस असंतोष को कम करने में सफल नहीं हो पा रही है। गौर करें तो अब तक 59 बार नियम बदले जा चुके हैं। हालांकि सरकार को कालाधन रखने वाले और इन नोटों को बैंकिंग सिस्टम में डालने के रास्ते अब दिखाई देने लगे हैं। बैंक जिन पर देशवासियों को भरोसा था वही सबसे अधिक भ्रष्ट निकले, सरकार को ऐसा अंदेशा नहीं था, इसके अलावा कई और तरीके सामने आ गए जिनके रास्ते कालाधन दौड़ रहा था। सरकार को इसका अनुमान नहीं था इसलिए उसने बार बार नियम बदले पर वह काम नहीं हो पाया जिस मकसद से सरकार ने यह कदम उठाया था। सरकार को अनुमान था कि कालेधन के रूप में जमा कम से कम तीन लाख करोड़ रुपये के नोट वापस नहीं आयेंगे लेकिन कालाधन चोर दरवाजे से बैंकिंग सिस्टम में आ गया, सरकार इन तिकड़मों को समझने में विफल रही। अब सवाल यह है कि बैंकों के पास सरकार के अनुमान से अधिक पैसा जमा हो गया है यह काला हो या सफेद इससे आम आदमी को कोई लेना देना नहीं, वह तो सिर्फ यह जानना चाहता है कि नोटबंदी से फायदा किस तरह से होगा। सरकार इसका लाभ आम लोगों तक कैसे पहुंचायेगी। यदि नोटबंदी से लाभ हुआ है, राजकोष भरा है, कालाधन नियंत्रित हुआ है तो सरकार सार्वजनिक करे कि इसका लाभ वह आमजन को कैसे देगी। सरकार यदि यहां भी चुप रहती है तो परिणाम सार्थक होने में संदेह है।

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