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बालिका पढ़ाई में पिछड़ा मप्र

बालिका पढ़ाई में पिछड़ा मप्र
ऐसा कोई क्षेत्र शेष नहीं बचा जहां यह कहा जा सके कि देश में मध्यप्रदेश की हालत अव्वल है। हर दिन कोई सर्वे रिपोर्ट या फिर सरकारी दस्तावेज सामने आते हैं जिसमें मध्यप्रदेश की गिरती हालत को चिंहित किया जाता है। अब तक जो भी रिपोर्टें मध्यप्रदेश के संदर्भ में लोकसभा के पटल पर रखी गई हों या फिर केंन्दीय मंत्रालयों द्वारा जारी की गई हों, हरेक में मप्र की हालत पतली होती दिखाई देती है। जबकि सरकार इन सच्चाइयों को स्वीकार करने को तैयार नहीं वह लगातार आंकड़ेबाजी कर सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करने में जुटी हुई है। यहां तक कि मुख्यमंत्री भी विभागों की झूठी जानकारियों के आधार पर प्रदेश की जनता को बेहतरी का सब्जबाग दिखाते रहते हैं। स्थिति यह है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही तमाम योजनाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं ये योजनाएं जिस वर्ग के लिए चलाई जा रही हैं उसका लाभ उस वर्ग को मिल ही नहीं रहा है लेकिन रिपोर्टों में शत प्रतिशत सफल बताई जा रही हैं। प्रदेश में आंकड़ेबाजी का यह खेल बहुत पुराना है और अफसरशाही सत्तातंत्र पर इस कदर हावी है कि वह बेलगाम है, उसके लिए मुख्यमंत्री हों या मंत्री आदेशों का पालन करना अनिवार्य नहीं रहा। अभी अभी मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें यह बताया गया है कि मध्यप्रदेश में विभिन्न कारणों के चलते बीच में पढ़ाई छोड़ने वाली बालिकाओं की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है और राज्य देश के उन पांच राज्यों में शामिल हो गया है जहां बालिकाओं की पढ़ाई को लेकर थोथी बातें की जा रही हैं। यह सभी जानते हैं कि बालिकाओं की पढ़ाई को लेकर केन्द्रीय सरकार चिंतित है और इसके लिए उसके द्वारा अभियान छेड़ा गया है इधर मध्यप्रदेश में भी बहुत पहले से बालिकाओं की शिक्षा को लेकर सरकार योजनाएं चला रही है, जिसमें स्कूल जाने के लिए साइकिल, छात्रवृत्ति, गणवेश और किताब कापियां मुफ्त में दिए जाने की सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं इसके बावजूद स्थिति में सुधार नहीं आ रहा है। इससे स्पष्ट है कि इस योजना की जमीनी सच्चाई में कहीं न कहीं घोटाला है। यह योजना बालिकाओं का स्कूल के प्रति आकर्षण बढ़ाने में सफल नहीं हुई, दुर्भाग्य से मप्र सरकार ने इस बारे में कभी जांच पड़ताल करने की कोशिश नहीं की कि आखिर करोड़ो रुपये खर्च करने के बावजूद योजना में कमी कहां रह गई। सच्चाई तो यह है कि सरकार का ध्यान स्कूलों की ओर नहीं हैं वह बालिकाओं को बेहतर स्कूल मुहैया नहीं करा पा रही है जहां उनके अनुकूल सुविधायुक्त वातावरण हो। प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की हालत बदतर है यहां पढ़ने के लिए जाने में बालिकाओं को खासी परेशानी का सामना करना पड़ता है, निचली कक्षाओं तक तक तो वह स्कूल जाने में संकोच नहीं करती लेकिन नौवी कक्षा के बाद उन्हें शिक्षा के साथ कई अन्य परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है पर सरकार इस ओर ध्यान नहीं देती। नतीजा सामने है कि प्रदेश उस सूची में शामिल हो गया जहां उसे नहीं होना चाहिए था। गनीमत है कि स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री इस सच्चाई को स्वीकार कर रहे हैं और अब इसमें कमी लाने की बात कह रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षकों की कमी को पूरा करने के प्रयास किए जा रहे हैं और कुछ नए हाई और हायर सेकेण्डरी स्कूल खोले जा रहे हैं। पर यह स्पष्ट नहीं हो सका कि आखिर वह वजहें कौन सी हैं जिसके कारण यह स्थिति पैदा हुई। जबकि मध्यप्रदेश से अलग होकर बने राज्य छत्तीसगढ़ बेहतर स्थिति में है यहां तक कि उप्र भी बेहतर हालत में है। महाराष्ट्र में यह 12.58 है तो राजस्थान में 13.40 प्रतिशत। मध्यप्रदेश में 23 फीसदी बालिकाएं बीच में ही पढ़ाई छोड़ रही हैं

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