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साधौ ये मुर्दों का गांव

हरियाली पर आरी

हरियाली पर आरी
विकास है तो विनाश होगा। यह सच है लेकिन विकास की तो कोई सीमा नहीं होती उसी तरह विनाश भी अंतहीन होता है। इन दोनो के बीच आपसी समझौता संभव नहीं है इसका अर्थ यह है कि विकास के नाम पर विनाश की आरी निर्बाध गति से चलती रहेगी और इसे रोकने की ताकत किसी भी तंत्र में संभव नहीं है। बहाने हजार हैं विनाश के लिए और इसकी क्षति की भरपाई करने की चतुराई भी होती है। बात पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की है, राजधानी भोपाल करीब दो दशक पहले हरियाली से भरी पूरी थी, हर पहाड़ियां पेड़ों और झाडियों से अटी पड़ी थीं। जिस नैसर्गिक वातावरण के लिए भोपाल मशहूर था उस पर तेजी के साथ आरी और कुल्हाड़ी चलाई जा रही है। कई सालों से पहाड़ियों पर निर्माण और चट्टानों में विस्फोट की गतिविधियां तेजी के साथ बढ़ी हैं, किसी न किसी बहाने वृक्षों को काटने की अनुमतियां दी जाती रहीं और इन्हें काटा जाता रहा। एक वृक्ष को काटने के बदले दस पौधे रोपने का संकल्प पत्र भरवाया जाता रहा, पर इस संकल्प को किसी ने भी पूरा नहीं किया। यहां विचारणीय यह है कि बीस साल पुराने मजबूत शाखाओं वाले घने छायादार वृक्षों की प्रतिपूर्ति क्या नए पौधों को रोप देने से संभव है, नहीं, पर शासकीय तौर पर इसे ही मान्यता दी गई है और इसी आधार पर राजधानी ही नहीं पूरे प्रदेश में जमकर पेड़ों की कटाई की जा रही है। बड़ी झील का डूबक्षेत्र भी अतिक्रमण की चपेट में है और इसकी भरपाई भारी पौधरोपण से की जायेगी, ऐसा कई सालों से प्रचारित किया जा रहा है पर हकीकत यह है कि यहां पौधे लगाए ही नहीं जाते और लग भी गए तो उन्हें जीवित रहने नहीं दिया जाता। दूसरी ओर राजधानी की सड़कें चौड़ी की जा रही हैं, कुछ पुरानी इमारतों को नया स्वरूप दिया जा रहा है, हर स्थान पर शहीद पेड़ ही हो रहे हैं। याद करें कुछ वर्षों पर सरकार ने पुराने वृक्षों को नए स्थान पर लगाने की कोशिश की थी और कुछ काम हुआ भी था लेकिन संभवत: इस खर्चीली व्यवस्था को सरकार ने चुपचाप बंद कर दिया। अब हालात यह हैं कि रोजाना कई दर्जन बड़े पेड राजधानी की सड़कों के किनारे से काटे जा रहे हैं। अनुमतियां सरकार ही दे रही है ऐसे में पर्यावरण के विनाश का रोना सरकार के लिए तो दिखावा और ढोंग ही है। क्योंकि जिस संख्या में पेड़ों की कटाई हो रही है उसके अनुपात में पौधरोपण का काम नहीं हो रहा है। पर्यावरण को बचाने की दिशा में कार्य करने वाले आयोग को भी सरकार गुमराह करने से भी नहीं चूकती। कागजपत्रों का यह खेल सरकार के लिए भले ही बचाव का रास्ता हो लेकिन मानव जीवन के लिए खतरनाक है। सरकार को या तो पर्यावरण के नाम पर जागरूकता के लिए पैसा खर्च करना, स्कूली बच्चों की रैलियां निकालना और विज्ञापन, होर्डिंग लगाना प्रदेश के नागरिकों के साथ छलावा है। राज्य सरकार को इस मामले में ईमानदार रहना चाहिए क्योंकि यदि वह यहां धोखा कर रही तो भविष्य को गर्द में डालने की पुख्ता कोशिश कर रही है। यदि पर्यावरण को साजिश के तहत बर्बाद किया जाता रहा तो फिर प्रकृति के प्रकोप को रोक पाना संभव नहीं होगा।

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