Powered By डॉ.राहुल रंजन
साधौ ये मुर्दों का गांव

राजनीतिक दलों को छूट पर संदेह

राजनीतिक दलों को छूट पर संदेह
राजनीति में कोई किसी का दुश्मन नहीं होता सब आपस में दोस्त होते हैं और यह दोस्त दोस्ती निभाने में ईमानदार रहते हैं। आम लोगों को राजनीतिक दलों के बीच भले ही दुश्मनी दिखाई देती हो पर हकीकत में ऐसा नहीं होता, वैचारिक मतभेद रहते हैं लेकिन कुछ मामले ऐसे होते हैं जिसमें इन मतभेदों को भूलना ही बेहतर होता है। वर्तमान मोदी सरकार ने नोटबंदी कर कालेधन के सांप को निकालने लिए तरह तरह के जतन किए हैं, हरेक की सांसें फूली हुई हैं, लोग परेशान हो रहे हैं। इस मामले में देश की जनता इस बात को लेकर खुश थी कि राजनीतिक दलों का कालाधन बर्बाद हो गया, वह पटरी पर आ जायेंगे लेकिन अंदर ही अंदर कुछ ऐसा खेल हुआ कि राजनीतिक दलों का कालाधन सफेद हो गया। सरकार ने राजनीतिक दलों के खातों को छानबीन से मुक्त कर दिया यहां तक कि पुराने नोटों के रूप में मिले चंदे को भी सफेद करने का रास्ता साफ कर दिया गया है। तो क्या देश में सिर्फ राजनीतिक दल ही ऐसे हैं जो दूध के धुले हुए हैं उनके खातों की न पड़ताल होती है और न ही उन्हें आयकर देना होता है। तो क्या देश में राजनीतिक दल चैरिटी कर रहे हैं, परोपकार के काम कर रहे हैं देश की जनता की मदद कर रहे हैं, क्या यह उनकी मदद कर रहे हैं जो असहाय हैं। कतई नहीं राजनीतिक दल ऐसा कोई काम पार्टी स्तर पर तो नहीं करते, यह किसी तरह का एनजीओ भी नहीं है और न ही ट्रस्ट हैं, फिर इन्हें किस नियम के तहत तमाम छूटें मिली हुई हैं। राजनीतिक दल लोकतंत्र में एक इंडस्ट्री की तरह हैं जो अपने लाभ के लिए काम कर रहे है। यदि यह देश के लिए कुछ कर रहे हैं तो उसकी कीमत भी वसूल रहे हैं। इन्हें वेतन भत्ते और सरकारी सुविधाएं मिल रही हैं। इतना ही नहीं महज पांच साल के राजनीतिक कैरियर में पूरे जीवन की सुरक्षा उपलब्ध है। प्रधानमंत्री मोदी राजनीतिक दलों के खातों को भी पारदर्शी बनाने के पक्ष में थे लेकिन अप्रत्यक्ष राजनीतिक दबाव के कारण उन्होंने भी इस मामले में चुप्पी साध ली। अब वित्तमंत्री जेटली बार बार आयकर की धाराओं को गिना रहे हैं जिनके तहत राजनीतिक दलों की भी जांच संभव है। जब कालेधन पर प्रहार किया गया तो फिर राजनीतिक दलों को इससे मुक्त क्यों किया गया यह सवाल खड़ा है। यह साफ साफ उन लोगों के साथ अन्याय है जो पूरे जीवन ईमानदारी से कमाते रहे और अपने खातों में या घरों में बचत का रुपया रख लिया। सरकार ने बेइमानों को कालेधन को सफेद करने के तमाम रास्ते धीरे धीरे खोल दिए हैं और आम आदमी को पटरी पर ला दिया है। साफ दिखाई दे रहा है कि प्रधानमंत्री भले ही दबंगई दिखा रहे हों पर राजनीतिक दलों से सीधे लड़ने का साहस उनमें भी नहीं है, चूंकि प्रधानमंत्री को भी तो अपने दल की चिंता करना है इसलिए रास्ता ऐसा अख्तियार किया गया जिससे सबका फायदा हो। नोटबंदी के बाद देश में जगह जगह छापे डाले जा रहे हैं नोट बाहर निकल रहे हैं। पर जहां सबसे अधिक राजनीतिक दलों के खातों में कालाधन जमा होने की संभावना थी उसे सरकार ने नजरअंदाज कर दिया है। सरकार की इस छूट का परिणाम गंभीर होगा , क्योंकि देश समझने चुका है कि नोटबंदी में सरकार ने अपनों को बचाने और लाभ पहुचाने का इंतजाम पुख्ता कर दिया है।

Share |