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साधौ ये मुर्दों का गांव

अभियानों की बाढ़...

साधो ये मुर्दो का गांव
डॉ.राहुल रंजन
अभियानों की बाढ़...
बिना झूठ राजनीति की नहीं जा सकती, जो जितना अधिक और बड़ा झूठ बोलता है वह बड़ा नेता बन जाता है। बशर्ते झूठ बोलने की कला आनी चाहिए और इसे इस तरह से प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि गलती से भी सच निकल जाए तो उसे लोग झूठ मान लें। यानि झूठ को सच की तरह परोसने मेंं सिद्धहस्त होना जरूरी है। संदर्भ यह है कि देश में राज्य हों या फिर केंद्र सभी सरकारों ने जनता से इतने वादे कर लिए हैं कि उनका पूरा होना असंभव है। हालत यह है कि साल के तीन सौ पैंसठ दिन तो सिर्फ सरकारों की घोषणाओं और वादों को पढ़ने गिनने में ही लग जायेंगे। अब जनता को गणित लगाना है कि कब कौन सी घोषणा की गई थी और कितनी पूरी हुई और कितनों पर काम हुआ। आश्वासनों की तो गिनती ही नहीं की जा सकती जैसा मौका देखा वैसा बोल दिया। चुनावों के समय ही इनका हिसाब किताब होता है जनता भी सयानी है वह भी ऐन चुनाव के समय ही अपनी बात मनवाने पर अड़ जाती है। हां यह सच है कि इस समय जो हो गया सो हो गया इसके बाद तो न नेताजी दिखाई देते हैं और न ही उनके पास जनता से मिलने का वक्त होता है। सरकारें शायद समझ गई हैं कि जनता उनसे जबाव तलब करने को तैयार बैठी है वह अब पुराना हिसाब किताब चुकता करने के मूड मे है। सरकारें यह जानती हैं कि वह वादों को पूरा करने की स्थिति में नही है इसलिए उसने इसका तोड़ निकाल लिया है वह अब तरह तरह के अभियानों से जनता को व्यस्त रखने में जुट गई है वैसे तो यह पहले भी किया जाता रहा है लेकिन इसका स्वरूप अब राष्ट्रीय हो गया है। चूंकि शिक्षित युवाओं को नौकरियां देना मुश्किल है, अशिक्षितों को रोजगार देना भी संभव नहीं है, नए उद्योग धंधे खड़े करना भी आसान नहीं है। चूंकि सरकारें पहले वादा कर चुकी हैं कि बंफर सरकारी नौकरियां निकलेंगी, रोजगार के नए अवसरों का ढ़ेर लग जायेगा, नए उद्योग स्थापित होंगे। हर सेक्टर में देश तेजी से आगे बढ़ रहा है इसलिए न युवाओं बल्कि सभी को चिंता करने की जरूरत नहीं है। अब ऐसा दिखाई दे रहा है कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला फिर क्या करें तो नेताओं ने नई बिसात बिछाई और नए नए अभियान शुरू कर दिये और इसमें जनता को पूरी तरह से उलझा दिया। कभी नशा मुक्ति, तो कभी सफाई तो कभी पर्यावरण ऐसे सैकड़ों अभियान हर सुबह सड़क पर दौड़ लगाते देखे जा सकते हैं। इन रस्मी अभियानों का औचित्य क्या है किसी को मालूम नहीं होता बस लोग जुट जाते हैं। पूरी सरकारी व्यवस्थाएं इनमें पसीना बहाती दिखाई देने लगती हैं। यह अजीब तरह का खेल है जो सरकारें खेलने में जुट गई हैं न जनता जागरूक होगी और न ही इन अभियानों से देश प्रगति करेगा, न रोजगार की समस्या हल होगी न रोटी कपड़ा मकान मिलेगा। पर इससे इतना होगा कि लोग काम में लगे रहेंगे यानि खाली नहीं बैठेंगे। सिद्धांत है कि खाली दिमाग शैतान का घर तो सरकारों ने इस सिद्धांत को पकड़ लिया है, वह इसमें आमजनता को उलझाए हुए हैं। बीरबल के सिखाए हुए तोते आसमान में मंडराते हुए माहौल बनाए हुए हैं देखते जाओ देश कितना आगे निकलता जा रहा है प्रगति की गंगा, नर्मदा का बहाव तेज हो गया है। युवाओं को चिंतित होने की जरूरत नहीं, किसान निश्चिंत रहें, गरीब, मजदूर परेशान न हों, सरकार ने अभियान छेड़ रखा है और आगे भी कई अभियान चलाए जायेंगे जो पूरी तश्वीर ही बदल देंगे। कहीं चौदह साल तो कहीं पांच साल बीत गए लेकिन तश्वीर जस की तस है। इधर ढ़ाई साल में केंद्र की सरकार ने जनता को इतना स्फूर्त कर दिया है कि वह सपनों की दुनिया में डूब गई है। ढ़ाई साल में ऐसा क्या हो गया जिसे नमूने के तौर पर देखा जाए सिर्फ अभियान छेड़े गए हैं, तरह तरह के अभियान, रोज नया अभियान, एक खत्म हुआ नहीं कि दूसरा नया अभियान। ऐसा दिखाई दे रहा है जैसे देश में परिवर्तन की लहर चल पड़ी हो। लेकिन अब हो यह रहा है कि कंप्यूटर फाइल की तरह एक अभियान दूसरे पर ओवरलेप हो रहा है यानि आगे पाट पीछे सपाट। यानि अरबों करोड़ों जनता को जगाने में जाया करने की जुगाड़ें हो चुकी हैं। चुनाव के समय देश उसी चौराहे पर रास्ता पूछते हुए मिलेगा कि उसे किस दिशा में जाना है।

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