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साधौ ये मुर्दों का गांव

मां कहती है कि ऐसा पता होता.

मां कहती है कि ऐसा पता होता... तो बचपन में ही तेरा गला घोंट देती। ऐसी औलाद से बेऔलाद होना ही अच्छा था यह दर्द तो जीवन भर सह सकती थी लेकिन जो दर्द तू दे रहा है वह मौत से भी बद्तर है। ये मां का दर्द है लेकिन उस मां की पीड़ा को देखने की कोशिश शायद ही इस देश में की जाती है जिसे हम भारतमाता के नाम से जानते हैं। सिर्फ स्कूलों में भारतमाता की जय बोला जाता है इसके बाद इसके मायने बदल जाते हैं। सच तो यह है जो सपूत थे वह तो आजादी की लड़ाई में खेत रहे और जो हैं वह सीमाओं पर डटे हुए हैं। इन्हीं का जज्बा है कि देश सुकून के साथ चैन की नींद सो जाता है। इन सपूतों पर मां को गर्व होता है। आजादी के बाद देश का माहौल जिस तरह से बदला उसमें सबसे अधिक बदलाव राजनीति में देखने को मिला। वैसे तो सकारात्मक परिवर्तनों का प्रभाव हर क्षेत्र में हुआ पर राजनीति में इसका ठीक उलटा हो गया। यहां से ईमानदारी और देशभक्ति, जनसेवा जैसे गुण विलुप्त होते गए। हालांकि गांधी को इस बारे में अभास था कि लोकतंत्र की जिस मजबूत बुनियाद पर वह हिन्दुस्तान को खड़ा करने जा रहे हैं उसकी नीव की ईटों में दीमक लग चुकी है। जबकि उन दिनों नेताओं की सोच थी जिस पर वह देश को आगे बढ़ाना चाहते थे, उनकी कथनी और करनी में अंतर कमतर था। वह जिद और धुन के पक्के थे। फिर नेताओं के पतन का ऐसा सिलसिला चल निकला कि आज नेता शब्द गाली की तरह हो गया है। देश जितना फला फूला उससे कही ज्यादा नेता फूल गए। लोकतंत्र इनके हाथ का गुलाम हो गया, उसे अब ये कठपुतली की तरह नचा रहे हैं। राजनीतिक दलों की दुकानें अब भव्य मॉल की तरह तन गई हैं इनके दफ्तर वातानुकूलित हो गए हैं और नेताओं के पास लज्जरी कारों। इनके मकान कोठियों में तब्दील हो गए हैं और बैंक बैलेन्स करोड़ों में पहुंच गया है। अब यह राजनीति का बिजनिस कर रहे हैं इनके लिए देशसेवा मायने नहीं रखती यह जो सेवा कर रहे हैं उसका एक एक पाई देश से वसूल कर रहे हैं। लोगों ने इनके सामने घुटने टेकने की एक बार गलती क्या कर ली है अब तो सिर उठाने से पहले सौ दफा सोचना पड़ता है। क्या शर्म नहीं आती, नेताओं को बाहुबली और दबंग जैसे अलंकारों से विभूषित कर रहे हैं। वाकई नेता अब बाहुबली हो चुके हैं ये गुंडे, बदमाश, हत्यारे, बलात्कारी, तड़ीपार, सजायाफ्ता और भी न जाने किन किन नामों से विभूषित हैं। देश के नेताओं की सूची निकालकर देखें तो अधिकांश चेहरे वही हैं जिनकी मानसिकता आपराधिक है यह सोचते भी अपराधियों की तरह ही हैं इनके चेहरे पर तेज नहीं बल्कि अपराधियों जैसी कुरूपता है। हमने अपने आंगन से राजनीति को झिड़ककर भगा दिया। हमने अपने बच्चों को भी नौकरियों के ऊंचे ख्वाब दिखा दिए। देशवासियों की इस सोच ने इतना बंटाढ़ार किया कि देश में राजनीतिक घराने खडेÞ हो गए। परिवारवाद इतना कि मरने मारने पर उतारू। बिहार, उप्र ही नहीं हर राज्य में इन राजनीतिक बाहुबलियों का कब्जा हो चुका है। बिना पैसे के राजनीति असंभव हो गई है दरी, कुर्सी बिछाकर और पंपलैट बांट कर राजनीति का क, ख, ग सीखने वाले भी अब राजनीतिक उद्योगपति हो गए हैं। उप्र में ही चल रहे विधानसभा चुनावों में हमारे नेताओं की जो अर्थकुंडली सामने आई है वह चौकाने वाली है, लखपति तो कोई है ही नहीं सब के सब करोड़ों के मालिक हैं। बात यहीं तक नहीं अस्सी फीसदी अपराधी भी चुनाव लड़ रहे हैं। ताज्जुब नही होता अब कि एक अदना सा पार्षद भी पांच साल में बड़ा बिजनिसमैन बन जाता है कुछ नहीं तो एकाध गिट्टी क्रेशर और दो चार खदानों की ठेकेदारी ले लेता है। वोट देने का अधिकार है और अब नाटो जैसी सुविधा भी मिल गई है पर इससे तो वोट खराब ही होता है आपकी नापसंद का कोई वजूद नहीं रह जाता। लोकतंत्र के पतन पर चिंता पूरा देश कर रहा है पर नेताओं का कुछ बिगाड़ नही पा रहा। वह तेजी के साथ मजबूत होते जा रहे हैं और तो और इन्होंने अपना एक अलग समाज बना लिया है जो आपस में बैठकर अपने मसले खुद सुलझा लेते हैं। आपके चाहने से क्या होगा, बसपा को भाजपा से हाथ मिलाना है तो मिला लेगी जनता क्या कर लेगी। कांग्रेस सपा के साथ है तो जनता ने क्या बिगाड़ लिया। राजनीति के इस नए समाज ने गठजोड़ का ऐसा नुस्का निकाल लिया है कि सब देखते ही रह जाते हैं। तमाम विपरीत विचारधाराएं सत्ता की बात पर आकर एक हो जाती हैं। यहां ठीक गायत्री परिवार की तर्ज पर राजनीतिक परिवार बन गया है। हम आप कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं। आज इन नेताओं की संकुचित सोचों ने देश को जातिवाद के झगड़े में इतना उलझा दिया है जितना कि आजादी के पहले भी नहीं था। इतनी गंदगी नेताओं ने फैला दी है कि देश का हर राज्य, हर सेक्टर सडांध मारने लगा है। युवाओं को भी इन्होंने भटकाकर अभिव्यक्ति के नाम पर इतना भ्रमित कर दिया है कि ये आपस में ही लड़ मर रहे हैं। अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की नीति से कई गुना आगे और विस्फोटक नीतियां अपनाई जा रही हैं। सोचें आज तक कितने नेता जेल भेजे गए, कितनों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप को साबित कर पाए, कितनों के यहां छापे डाले गए, कितनों की अकूत संपत्ति की छानबीन की गई, कितनों ने अपनी आय का स्रोत बताया और आयकर भरा। कोर्ट, कचहरी, थाने ही नहीं किस विभाग में इतनी ताकत है जो इनके खिलाफ कार्रवाई कर सके। लोकतंत्र के चारों स्तंभों में से अकेले विधायिका ही सबको नियंत्रित कर रहीं है। संसद से लेकर विधानसभाओं में बैठे कुछ हजार लोग विश्व के सबसे युवा देश को दिशाहीन कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।

 
 
 
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