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साधौ ये मुर्दों का गांव

ये बदलाव अच्छे हैं...

ये बदलाव अच्छे हैं...
बहुत पहले दाउदी बोहरा समाज ने शादी विवाह कार्यक्रमों में दिखावे और अन्न की बर्बादी को रोकने के लिए मीनू तय कर दिया था इसके बाद जैन समाज ने भी इस ओर कदम बढ़ाए। अब अन्य समाजों में भी इस तरह का अनुशासन अनिवार्य किया जा रहा है। अकेले खानपान ही नहीं बल्कि कुछ और चौकाने वाली परम्पराओं की भी इसी तर्ज पर शुरूआत की गई है, अब शादियों में सात के स्थान पर आठ फेरे लगाने की परम्परा चल पड़ी है आठवां फेरा बालिका भू्रण हत्या न करने का है। समाज में कुछ और भी इन दिनों हो रहा है वह है बालिकाओं को पढ़ाने बढ़ाने को लेकर और शराब, नशे से दूर रहने का संकल्प लिया जा रहा है। मृत्युभोज को लेकर तो बहुत पहले से ही जागरूक हो रहा है कई समाजों में इस प्रथा को या तो बंद कर दिया गया है या फिर इसे बहुत सीमित अर्थात औपचारिक बना दिया गया है। हालांकि दहेज को लेकर अभी समाज उतना जागरूक नहीं हुआ है और न ही शादी समारोहों में पैसे की बर्बादी कम हुई है पर लोग सोचने पर बाध्य हो रहे हैं। बाल विवाह के मामलों में भी लगातार कमी आई है वहीं लोग लड़कियों को स्कूल भेजने के मामले में हिचक नहीं रहे। कुछ कोशिश सरकार कर रही है तो कुछ समाज के लोग। दोनों के तालमेल से हो रहे इस परिवर्तन से समाज की दशा और दिशा बदलने में काफी मदद मिलेगी यह तय है। एक समय था कि लोग अपने ही परिजनों को खून दान करने से कतराते थे लेकिन अब माहौल बदला है। रक्तदान को लेकर कई तरह की गलत फहमियां हैं जिन्हें दूर करने के प्रयास हो रहे हैं पर सभ्य और पढ़े लिखा वर्ग आगे आने से कतरा रहा है। कुछ समय पहले नेत्रदान को लेकर देश में जनजागरण चलाया गया था इससे कई लोगों के जीवन में रोशनी आ गई थी। अब अंगदान को लेकर मुहिम चल रही है। देखा जाए तो समाज अपने स्तर पर जिस तरह के सुधार चाहता है वह उन्हें देरसबेर सफल हो जाता है पर सरकारी स्तर पर जो प्रयास होते हैं उसमें प्रशासनिक, तकनीकी और कई तरह की अड़चने रहती हैं जिससे कि व्यक्ति उनसे जुड़ नहीं पाता। फिलहाल अर्थी को कांधा देने, श्मशान जाने, चिता को आग देने और कर्मकांड निभाने की जिम्मेदारी परिवार में पुरुषों की होती थी, पर अब ऐसा नही हैं लड़कियां, महिलाएं आगे आ रही है और समाज उन्हें प्रोत्साहित कर रहा है। चूंकि जहां समाज किसी परिवर्तन का समर्थन करने के लिए आगे आता है वहां समस्याएं कम होती हैं क्योंकि हमारी सामाजिक व्यवस्थाओं का अनुशासन काफी हद तक बेहतर है। कई समाजों ने व्यर्थ में पैसे की बर्बादी और दकियानूसी परंम्पराओं, मान्यताओं को दरकिनार करने के लिए कठोर कदम उठाए हैं। इस मामले में भले ही सभ्य समाज अपने कदम पीछे हटा लेता हो पर जहां समाज के वह वर्ग जो हर तरह से पिछड़े हैं सामाजिक परिवर्तनों का समर्थन कर रहे हैं। जन्मदिन और पुण्यतिथि पर अस्पतालों या निशुल्क भोजन वितरण कर रही संस्थाओं में दान या एक दिन का खाना बंटवाने में लोगों की रुचि बढ़ी है। ऐसे परिवर्तनों को समर्थन देना समाज के हर वर्ग का दायित्व है।

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