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साधौ ये मुर्दों का गांव

तेलंगाना में विवादित फैसला

तेलंगाना में विवादित फैसला
बालिक बचाओ, बालिका बचावो। इस सूत्रवाक्य का पूरे देश में पालन किया जा रहा है। सरकारें चाहे वह केंद्र की हो या राज्यों की सभी बालिकाओं के मामले में सहानुभूति का रवैया अपनाए हुए हैं, बालिकाओं को लेकर जिस तरह का माहौल है उस पर सभी चिंतित हैं और कोशिश की जा रही है कि बदलाव आए और इनकी जिंदगियां बेहतर ही नहीं बल्कि सुदृढ़ हों। हजार दिक्कतों और अडंगो के बाद भी यह मुहिम चल रही है, इसका असर भी दिखाई देने लगा है लेकिन विचार और मानसिकता में परिवर्तन न करने के लिए आमादा लोगों के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता पर चिंता तब अधिक बढ़ जाती है जब सत्ता में बैठे लोग ही दोहरी भूमिका निभाने लगते हैं। तेलंगाना सरकार के एक फैसले ने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि दकियानूसी सोच को पकड़ कर बैठे उन लोगों का क्या करें जो नीति निर्धारक है। इस फैसले के तहत राज्य के आवासीय कॉलेजों में शादीशुदा महिलाओं के एडमिशन पर पाबंदी लगा दी है। सरकार का कहना है, विवाहित महिलाओं के यहां पढ़ने से अनमैरिड लड़कियों का ध्यान भटकता है। तेलंगाना सरकार ने कहा है कि केवल अविवाहित महिलाएं राज्य के समाज कल्याण आवासीय डिग्री कॉलेजों में अध्ययन करने के लायक हैं। हैरानी वाली बात यह है कि यह नियम एक साल के लिए है और इन आवासीय कॉलेजों में इस तरह की 4000 महिलाएं पढ़ रही हैं, जो आगामी शैक्षणिक सत्र में दूसरे साल में प्रवेश करेंगी। तेलंगाना सोशल वेलफेयर रेजिडेंशियल एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स सोसाइटी (टीएसडब्ल्यूआरआईईएस) एक अधिसूचना जारी कर कहा है, ' अकादमिक वर्ष 2017-18 से बीए/बीकॉम/बीएससी फर्स्ट ईयर के डिग्री कोर्सों के लिए महिलाओं (गैरशादीशुदा) से आवेदन आमंत्रित किए जा रहे हैं।' सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कोई भूल नहीं है, अधिकारियों ने बताया कि क्यों वे अविवाहित महिलाओं के लिए प्रवेश रोक रहे हैं। टीएसडब्ल्यूआरआईईएस कें कंटेट मैनेजर वेंकट राजू ने टीओआई को बताया, ' ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि शादीशुदा महिलाओं को एडमिशन देने पर उनके पति भी कॉलेज में आते रहते हैं और इस वजह से बाकी महिलाओं का ध्यान भटक सकता है। हम स्टूडेंस की पढ़ाई में किसी भी तरह का व्यवधान नहीं चाहते हैं।' वहीं सोसाइटी के सेक्रेटरी डॉ.आरएस प्रवीन कुमार ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं के लिए आवासीय डिग्री कॉलेज बनाने का मकसद यही था कि बाल विवाह की प्रथा को तोड़ा जा सके। लेकिन हम उन्हें एडमिशन लेने से नहीं रोक सकते। यह सीधे सीधे महिलाओं को संविधान के अनुसार तय किए गए अधिकारों का हनन है। इससे साफ है कि तेलंगाना सरकार की महिलाओं को लेकर बहुत ही तुच्छ मानसिकता है। इस फैसले को लेकर विरोध में आवाजें उठने लगी हैं लेकिन विरोध करने वाले सामाजिक संगठन हैं। किसी भी राजनीतिक दल के शीर्ष नेता ने इस फैसले के विरोध में आवाज उठाने की जुर्रत नहीं की है। सोचने वाली बात है कि शादी शुदा महिलाओं के पतियों के स्कूल, कालेज आने से गैरशादीशुदा लड़कियों का ध्यान भटकता है यानि सरकार सीधे सीधे लड़कियों पर आरोप लगा रही है और वह भी इतना गंभीर। ऐसे तो नेता हर मुद्दे पर बीच में टांग अड़ाने में देर नहीं करते लेकिन इस मामले में सब चुप दिखाई दे रहे हैं। इन नेताओं को तब पुरूषों से कोई तकलीफ नहीं होती जब किसी महिला सरपंच का पति पूरा कामकाज देखने लगता है तब इन्हें काम करने से रोका नहीं जाता। चूंकि यह मामला राजनीतिक स्वार्थ का है इसलिए सब चुप हैं। कहना यह है कि इस तरह के दोहरे चरित्र के कारण देश में महिलाओं की छवि को आघात लगेगा अत: जानबूझकर की गई इस गलती का जल्द सुधारा जाए।

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