Powered By डॉ.राहुल रंजन
साधौ ये मुर्दों का गांव

झूठ के पांव...

झूठ के पांव...
कहावत है झूठ के पांव नहीं होते। इसे किस संदर्भ में कहा गया होगा यह तो नहीं पता लेकिन अब तो झूठ के पांव नहीं बल्कि पंख भी हैं। ऐसा ही एक और शब्द है जिसे आम बोलचाल में प्रयोग में लाते हैं वह है सफेद झूठ। यानि की झूठ में भी सच। झूठ बोलने की भी एक कला है यह सभी से बोला नहीं जाता। लेकिन कुछ इसमें इतने माहिर होते हैं कि उनके झूठ के आगे सच भी पानी मांगता दिखाई देता है। आम जीवन में ऐसे झूठों का सामना कभी कभार ही होता है लेकिन राजनीतिक जीवन में तो सच की मुडेर पर झूठ ही बैठा रहता है, सच तो शायद ही कभी बोला जाता हो, पर यह जरूर है कि जो झूठ बोला जाता है वह सच की लाइन में ही खड़ा रहता है। लोग इस झूठ को सुनते हैं, तालियां बजाते हैं और जयकार करते हैं। इस समय देश के उत्तरप्रदेश में झूठ की फसल लहलहा रही है। कोई मंच पर झूठ लिखकर लाता है और सुनता है, लोग बड़े चाव से सुनते हैं ऐसे जैसे कि ये राजा हरिश्चन्द्र के वंशज हों। यहां एक दल का पूरा कुनबा ही घर से सत्तू खाकर निकला है, पानी पी पी कर इस कुनबे की अगली पीढ़ी झूठ के ताबीज बांध रही है। कुनबे की पढ़ी लिखी बहु को भी शायद पहली बार यह अभिमान हुआ होगा कि दकियानूसी प्रदेश में वह बोलने के लिए स्वतंत्र है। आखिर उसे बोलना वही है तो सच नहीं है। एक हैं उत्तरप्रदेश को जीतने के लिए हर तरह की तैयारी के साथ डटे हुए हैं। इनके पास भी झूठ का इतना नायाब संग्रह है कि लालीपाप मुंह में लिए बिना ही मिठास का एहसास होने लगता है। दो राय नहीं कि झूठ बोलना यदि नहीं आता तो नेता नहीं बन सकते, राजनीति करने की पहली शर्त यही है कि झूठ बोलो और उसे इतनी सफाई से कि समझने वाला उसके अर्थ अपने मन से ही लगाता रहे। उत्तरप्रदेश के चुनावों में एक से बढ़कर एक झूठ बोले जा रहे हैं। प्रदेश में सत्ता पर काबिज दल का तर्क हैं उसने हमेशा सच का साथ दिया है। प्रदेश की दिशा और दशा को बदलने में उसने कोई कसर नहीं रखी। हां यह सच ऐसा है कि आइना देखते ही सच्चा चेहरा दिखा देता है। मतदाता तो बेचारा है उसे तो सभी को सुनना है तभी तो वह किसे वोट देना है, तय कर पायेगा। पूरे प्रदेश में इन दिनों झूठ का इतना प्रदूषण फैल गया है कि मतदाता का माथा फिरता दिखाई देने लगा है। हालात तो यह हो गए हैं कि नेता उसे झूठ पकड़ने की मशीन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं वह उसी से पूछ रहे है बताओ ऐसा था कि नहीं, ऐसा हुुआ था कि नहीं। यहां पहले राज कर गर्इं एक माननीया लिखा हुआ झूठ बोलती हैं। उनके भावशून्य चेहरे को पढ़ पाना मुश्किल है। खैर वह भी जनता से ही जवाब मांग रही हैं। जो सत्ता में है वह तो यहां कुछ करा नहीं पाए और अब मतदाताओं से कह रहे हैं एक और मौका दो, शायद झूठ में अभी दम बाकी है। और जो भाई दिल्ली से शेरों को लेकर गए हैं वह भी कम नहीं है उनके झूठों की तो अब पूरे देश में चर्चा होने लगी है। सिर्फ इतना ही कहना है कि इस झूठ की पतंग को काटने का साहस मतदाताओं को दिखाना होगा। मत चूको चौहान की तर्ज पर झूठ की हलक में वोट का बाण उतार दो।

Share |