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साधौ ये मुर्दों का गांव

मुनाफे की नीति बनी नहीं

मुनाफे की नीति बनी नहीं

सरकारों ने किसान के चरित्र का जो खांका खींच रखा है उसमें वह दरिद्र ही दिखाई देता है। नंगे पैर, घुटनों तक धोती, चेहरे पर धंसी हुई आंखें और पिचके हुए गाल, झुर्रियों को समेटता बदन। बार-बार हाथ फैलाकर कभी आसमान से भीख मांगता तो कभी सरकारों से। सोचने को बाध्य करता है कि आखिर ऐसे हालात क्यों बने कि किसान आजादी के बाद भी मिट्टी से सने हाथों को धो नहीं पाया जबकि खेती में उसकी पुश्तों ने जीवन खपा दिया न जाने कितने टन अनाज पैदा किया लेकिन आज भी उसके चूल्हे पर हंडिया भर भात भी नहीं बन पाया। आज भी वह पानी पीकर ही रात करवटों में काट देता है क्यों नहीं उसके बच्चे पढ़ पाए। ऐसा नहीं है कि खेती किसानी के क्षेत्र में काम नहीं हुआ, बहुत उन्नति हुई है आज खेती के तौर तरीके बदल गए हैं और उत्पादन भी इतना होने लगा है कि देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका है। स्थिति तो यह है कि आज अनाज इतना उपज रहा है कि सरकारी गोदामों में रखने को जगह नहीं है इतना ही नहीं करोड़ों टन अनाज तो हर साल सड़ रहा है। इनके बावजूद किसान जहां का तहां खड़ा है आज भी वह कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। साहूकारों से किसी तरह पिंड छुड़ा पाया तो सहकारी और सरकारी बैंकों ने उसकी चमड़ी उधेड़ दी है। क्या सरकारें इस स्थिति से वाकिफ नहीं हैं, हैं सौ फीसदी लेकिन वह जानती हैं कि यदि किसान मजबूत हो गया तो उसकी हालत पतली हो जायेगी। किसान सबसे बड़ा वोट बैंक है इसलिए सरकार या राजनीतिक दलों ने इस तरह की रणनीति बना रखी है कि वह उनके सामने सीधा तन कर खड़ा न रह सके, उसे एक मुश्त नहीं टुकड़ों में सुविधाएं दी जाती हैं। छूट और मुआवजे का निवाला उसे खिलाया जाता है लेकिन इतना कि उसका पेट पूरा न भर सके। सरकारें जानती हैं कि वह जब तक भूखा रहेगा तब तक ही उसका कहना सुनेगा। खेती को लाभ का धंधा बनाने का शिगूफा छोड़कर सरकारों ने किसान को भ्रमित कर दिया है वह अच्छे दिन आने के सपने संजोने लगा है, जबकि हकीकत यह है कि उसके सपने कभी पूरे नहीं होंगे। आज किसान फसल उपजाने के लिए जितना खर्च करता है, उसे बेचकर भी वह उतना नहीं कमा पाता। सरकारें मदद का ढोंग करती हैं क्योंकि मदद की जो चादर उसे ओढ़ाई जाती है उससे वह पूरा ढक नहीं पाता सिर छुपाता है तो पैर बाहर निकल जाते हैं। सरकारों के पास उत्पादन बढ़ाने के संसाधन तो हैं लेकिन ज्यादा उपज से निपटने का न कोई तरीका है न उपाय। सरकार समर्थन मूल्य तो बढ़ा देती है पर किसान की पूरी उपज खरीदने का साधन नहीं है। एक लिमिट तक ही सरकारें खरीदी कर सकती हैं क्योंकि सरकार के पास स्टाक करने के संसाधन सीमित हैं इसलिए किसान मारा जाता है। हालांकि किसान जानता है कि कर्ज माफी से उसकी समस्या का अंत नहीं होगा सिर्फ मौत की तारीख आगे बढ़ जायेगी। किसी भी सरकार में इतनी ताकत नहीं कि वह किसानों के कर्ज एक मुश्त माफ कर उन्हें जीवनदान दे दे। वह छूट दे सकती है वह भी ब्याज में या फिर आपदाओं के बहाने वसूली को टाल सकती है पर पैसा नहीं छोड़ सकतीं। घोषणाएं सिर्फ हवाएं होती हैं सरकारें इसके पीछे खेल खेलती रहती हैं। सच तो यह है कि सरकारें खेती किसानी के गणित को आज तक नहीं समझ सकी हैं और न ही समझने की कोशिश कर रही हैं। खेती मुनाफे में लाने के लिए फूड प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण) को युद्धस्तर पर बढ़ावा देने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। इस दिशा में अभी तक देश में सच मानो तो कोई काम ही नहीं हुआ है।

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