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साधौ ये मुर्दों का गांव

हमारी चोटों का बदला ले रहा है मौसम

यह दिसम्बर का महीना है और गुलाबी ठंड का रास्ता देख रहे हैं जबकि रजाइयों में रात में दुबकने और दिन भर गर्म कपड़े लादे रहने का यह महीना है। दूसरी ओर चेन्नई में सौ साल का रिकार्ड टूट गया बारिश थमने का नाम नहीं ले रही है, शहर समुन्दर में तब्दील हो गए हैं। उधर पहाड़ी क्षेत्र शिमला बर्फ गिरने का इंतजार कर रही है। किसान खेतों में नमी न होने से बोवनी करने से घबरा रहा है। आम लोग इस बिगड़े मौसम के बीच अपने स्वास्थ्य का संतुलन बनाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। हर घर में एकाध बीमार है, खांस रहा है। जलवायु के दुनियाभर पर पड़ रहे इन प्रभावों को लेकर पेरिस में गंभीर चर्चा हो रही है। बताया गया है कि यह सब कुछ पृथ्वी का तापमान मात्र एक डिग्री बढ़ने से हुआ है। पूरी दुनिया इसके प्रभाव में आ गई है। खाड़ी देश जो पानी को तरसते हैं वहां मूसलाधार बारिश हो रही है, ऐसी बारिश के लिए यह देश तैयार नहीं थे क्योंकि यहां सदियों से ऐसा नहीं हुआ। भारत में राजस्थान में खेती हो रही है यहां लोग गर्म कपड़े पहनने लगे हैं और मध्यप्रदेश का राजस्थान से जुड़े क्षेत्र लगातार बंजर हो रहे हैं यहां भीषण गर्मी पड़ रही है। चूंकि हम मनुष्य हैं, हम हर तरह के ज्ञान से परिचित हैं हम जानते हैं कि यह सब क्यूं हो रहा है। जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह क्या है फिर भी इसे रोकने की दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ाते , सरकार पर आश्रित हैं कि वह कुछ करेगी, लेकिन सरकार सुविधाएं और मदद मुहैया करा सकती है पर मौसम को मुट्ठी में कैद नहीं कर सकती। चिंता कर सकती है, जागरूकता के लिए प्रयास कर सकती है, कुछ बंदिशें लगा सकती है पर इससे कुछ संभव नहीं होगा। पूरी दुनिया का सूरज भी एक है और आसमान भी एक है, हवा जो भारत में बहती है वह और भी देशों में निर्बाध पहुंचती है और वहां से लौटकर भारत आती है। धरती के अंदर लगातार होने वाले परिवर्तनों का दुनिया पर असर हो रहा है। इन परिवर्तनों पर सीमा का कोई बंधन नहीं हैं, सूरज के बढ़ते तापमान का असर दुनिया पर एक साथ हो रहा है। धरती कांप रही है, भूकंपों की विनाशकता बढी है, सुप्त ज्वालामुखियों में फिर से हलचल दिखाई देने लगी है। भारत ही एक मात्र ऐसा देश था जहां मौसम परिवर्तन का नियत समय था लेकिन अब ऐसा नहीं रहा, मोटे तौर पर देखें तो इसमें एक से डेढ़ माह अंतर आया है। मौसम विज्ञानी अपने शोधों को फिर से फिर से देखने पर मजबूर हो रहे हैं, आंकलन और भविष्यवाणियां धोखा दे रही हैं। मनुष्य ने अपने जीवन के संरक्षण और भविष्य की चिंताओं को लेकर प्रकृति से लगातार छेड़छाड़ की है इसमें कमी आने के बजाय यह रोज तेज गति से आगे बढ़ रही है। प्रकृति जिन्हें अस्वीकार्य करती है मनुष्य उन्हीं क्षेत्रों में सर्वाधिक छेड़छाड़ कर रहा है। बढ़ता औद्योगिकीकरण इसके काफी जिम्मेदार है, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, बडेÞ बांधों का निर्माण, शहरीकरण, वन्यजीवों और वन्यक्षेत्रों पर आक्रमण, कार्बन का उत्सर्जन, रेडियोधर्मी तरंगों का वातावरण का घुलना, भूजल का बेदर्दी से दोहन ऐसे लाखों कारण और कारक मौजूद हैं जिन्होंने जलवायु को प्रदूषित कर दिया है। इस प्रदूषण को रोकने के लिए बहुत जल्दी और तेजी से, कठोर उपाय नहीं किए गए तो इंसान ही नहीं पृथ्वी का अस्तित्व खतरे में आ जायेगा। यह खतरा आतंक से कहीं अधिक बड़ा है जहां मौत क्षमा नहीं करेगी।

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