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साधौ ये मुर्दों का गांव

देश का समय बर्बाद कर रही संसद

देश की संसद में इन दिनों एक ऐसे मुद्दे पर नरम गरम बहस चल रही है जिस पर काफी समय से देश में उबाल आया हुआ है,यह शब्द है असहिष्णुता। कांग्रेस इसे लेकर चिंतातुर है वह इस बहस को विपरीत दिशा में भटका रही है, वह गांधी और नाथूराम गोड़से को घसीट रही है। कांग्रेस नेता विषय से भटक कर पीएम मोदी को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। संसद में हो रही इस बहस की सार्थकता समझ से परे है, क्योंकि यहां भी वही चल रहा है, सड़क से उठकर यह मामला घर तक पहुंच गया और तनाव पैदा करने लगा है। इस शब्द की सही सही व्याख्या अब तक नहीं हो सकी है, संसद देशवासियों के कंफ्ूजन को शायद ही दूर कर सके लेकिन राष्ट्रपति डॉ.प्रणव मुखर्जी ने इसे साबरमती आश्रम में दूर कर दिया है। डॉ. मुखर्जी ने कहा कि भारत की असल गंदगी गलियों में नहीं, बल्कि हमारे दिमाग में है, यह गंदगी हमारे बीच समाज को विभाजित करने वाले विचारों को दूर करने की अनिच्छा में है। राष्ट्रपति के इतने स्पष्ट बयान के बाद असहिष्णुता पर चर्चा और बहस अर्थहीन हो जाती है। यह समझ से परे है कि संसद में बैठे लोग जिन्हें लोग बड़ी उम्मीदों और आशाओं से वोट देकर जिताते हैं ये लोग संसद में बैठकर देश का मूल्यवान समय बर्बाद कर रहे हैं। वैसे तो संसद में ऐसा कई बार अर्थहीन मुद्दों को लेकर हंगामा हुआ है, जमकर कीचड़ उछाली गई, गरिमा को गंदा किया गया, कभी मर्यादा को तार तार किया गया। माननीय सांसदों की औकात को लेकर शर्मशार भी हुए हैं। लाख थू-थू होने के बाद भी माहौल सुधरा नहीं बल्कि बिगड़ता ही जा रहा है। ऐसे भाषणों और वक्तव्यों से लोगों की न भूख मिटने वाली है न तन ढ़कने को कपड़े और न रहने को छत मिलने वाली है। वर्तमान में देश के हालात की चिंता करने की जरूरत है, आर्थिक संसाधनों को बढ़ाने और बाढ़ की तरह तेजी से आ रहे शिक्षित युवाओं को रोजगार देने की है। यदि इस युवाओं की इस बाढ़ को थामने के प्रयास तेज नहीं किए गए तो आने वाले समय में यही विध्वंश का कारण बन जायेंगे। कांग्रेस और विपक्ष जानता है कि यदि उसने संसद में भाजपा की हां में हां मिलाई तो उसके पैर अंगद की तरह जम जायेंगे और फिर उन्हें दुबारा सत्ता हासिल नहीं होगी। यही वजह है कि संसद में सरकार को बिलावजह के मुद्दों में उलझाए रखने की साजिश रची गई है। पीएम मोदी ऐसे में चाहकर भी कुछ नहीं कर पायेंगे, पांच साल तक सिर्फ योजनाओं की घोषणा करते रह जायेंगे। मोदी जी ने जैसा वादा देश से किया है उसे निभाने में अड़चनें बहुत हैं, उनके अठारह घंटे काम करने से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे लोग ही नींद में हैं जिन्हें जागते रहना था। पीएम ने स्पष्ट कहा कि ऐसे तू-तू, मैं- मैं से देश नहीं चलता, बिखरने के बहानों के बीच जुड़ने के अवसर खोजने चाहिए। मोदी जी ने बात सटीक कही है पर दुर्भाग्य कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में ऐसे लोगों की तादात अधिक होती जा रही है जिनके लिए देश मायने नहीं रखता। इस अर्थहीन बहस में वे मुद्दे तिरोहित हो गए जो बेहद जरूरी थे। भ्रष्टाचार, विकास योजनाएं, रोजगार, आर्थिक उन्नति, रोटी, कपड़ा और मकान पर सांसदों को चिंता नहीं, आखिर हो भी कैसे उनके हित तो पूरे हो रहे हैं।

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