Powered By डॉ.राहुल रंजन
साधौ ये मुर्दों का गांव

तो गोली क्यों नहीं मार देते

आतंकवादी संगठन आईएसआईएस भारत में घुसपैठ का मौका देख रहा है वह सीमापार से पाक आतंकियों को मदद करने के लिए बेताब है, उसने मदद करना शुरू कर दी है। भारतीय सेना के अधिकारी और गुप्तचर तंत्र इस मामले में सरकार को लगातार सूचनाएं देकर आगाह कर रहा है। कश्मीर की सरकार कोई ठोस कदम उठाने के बजाय आतंकियों और पाकिस्तान के समर्थन का सुर अलाप रही है। कश्मीर में आईएस के झंडे सड़कों पर लहराने लगे हैं पर इन पर कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति वहां की सरकार में दिखाई नहीं दे रही वह केंद्र सरकार को नीतियों पर पुनर्विचार करने का दबाव बना रही है। कश्मीर में चुनाव के बाद भले ही भाजपा के समर्थन से सरकार बनी हो लेकिन भाजपा की स्थिति मजबूत नहीं बन पा रही है। आजादी के बाद से वर्तमान तक कभी ऐसा मौका नहीं आया जब घाटी में शांति बहाल हो सकी हो, कुछ समय के लिए जरूर यहां आतंकी गतिविधियों में कमी आई थी लेकिन अब हालात ऐसे नहीं रह गए। सीमापार पाकिस्तान सीजफायर का उल्लंघन लगातार कर रहा है इसमें सौ फीसदी की बढ़ोत्तरी देखी गई है मतलब मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सीमा पर तनाव की स्थिति पहले की तुलना में कही अधिक तनावपूर्ण हो गई है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने सेना को आतंकवादियों से निपटने के लिए खुली छूट दे दी है बावजूद इसके घाटी में आतंकवादियों की घुसपैठ को रोकने में सफलता नहीं मिल पा रही है। चूंकि घाटी में ही कुछ ऐसे तत्व मौजूद हैं जो आतंकवादियों को पनाह ही नहीं देते बल्कि उनको उकसाने में जुटे हैं। इन तत्वों पर घाटी की सरकार भी कार्रवाई करने से हिचकती है, ये तत्व और वहां की सरकार मिलकर ऐसा माहौल बनाए हुए हैं जिससे कि घाटी में शांति स्थापित न हो सके। वही दूसरी ओर पाकिस्तान इस क्षेत्र में लगातार दहशत का माहौल बनाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे अशांत क्षेत्र घोषित कराने पर तुला हुआ है। आजादी के बाद से आज तक रक्षाबजट का अधिकतर हिस्सा सीमापार के आक्रमणों को रोकने में खर्च हो जाता है। इस तनाव से देश की तरक्की बाधित हो रही है और घाटी में पर्यटन समाप्त सा होता जा रहा है जो कि बहुत बड़ा आर्थिक आधार था। पाक कभी अपनी हरकतों से बाज नहीं आयेगा, उसे किसी भी वार्ता से कोई लेना देना नहीं है वह सिर्फ इस मुद्दे को जिंदा रखना चाहता है चूंकि पाकिस्तान की राजनीति कश्मीर को लेकर जिंदा ही है। ऐसे में भारत को से ऐसे कदम की अपेक्षा की जाने लगी है तो सार्वजनिक हो, कूटनीतिक समाधान का वक्त अब शेष नही रहा। घाटी में आंतकियोंं की सभाएं, उनके तथाकथित समर्थक और राजनेताओं की गतिविधियों को रोकने की कोशिशों का वक्त भी अब नहीं रहा। अब वक्त है सेना को खुली छूट देने का उनकी बंदूकों की गोलियों को दनादन बरसाने का। घाटी में बैठे इन देश के गद्दारों को बंदूक की गोली ही सबक सिखा सकती है। आतंकवादियों और उनके समर्थकों को पकड़कर जेल में बंद करना समस्या का समाधान नहीं बल्कि इनको गोली मार देना ही ठीक है। हमें अपनी नीतियों से मानवीय दृष्टिकोण को छोड़ना होगा, मानवाधिकारों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।

Share |