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साधौ ये मुर्दों का गांव

बड़वानी कांड सरकार की गलती

बड़वानी जिला चिकित्सालय में मोतियाबिंद के आपरेशन के दौरान 46 लोगों के आंखों की रोशनी चली गई। हालांकि यह पहला मामला नहीं है, ऐसा प्रदेश में कई बार हो चुका है खासतौर से सरकारी नेत्र या नसबंदी शिविरों में इस तरह की घटनाएं आम हैं। सरकार ऐसे मामलों में सीधे चिकित्सक को दोषी ठहरा देती है और कार्रवाई कर उसे या तो निलंबित कर दिया जाता है या नौकरी से निकाल दिया जाता है, जबकि चिकित्सक की कोई गलती नहीं होती वह अपने दायित्व का निर्वाह ईमानदारी से करता है। ऐसे चिकित्सा शिविरों को आयोजित करने से पहले चिकित्सक बाकयदा मौके की चिकित्सीय रिपोर्ट सरकार के पास भेजते हैं, विधिवत प्रक्रिया के तहत सरकार और संबंधित विभाग और उसके अधिकारियों के पास तत्संबंधी रिपोर्ट होती है लेकिन सिर्फ टारगेट को पूरा करने के लिए चिकित्सकों पर दबाव बनाया जाता है और उन्हें आपरेशन करने को बाध्य किया जाता है। कहीं संक्रमित ओटी, तो कहीं पुराने औजार तो कहीं तंबुओं में असुरक्षित वातावरण में चिकित्सकों को मजबूरी में आपरेशन करना होते हैं। इस तरह की लापरवाही के लिए सीधे तौर पर सरकार और स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग जिम्मेदार हैं पर अप्रत्याशित घटना होने पर जवाबदेही लेने को कोई तैयार नहीं होता, अफसर घुमा फिरा कर बातें करते हैं, सरकार किरकिरी से बचने के लिए चिकित्सकों को निलंबित कर मामले को ठंडा करने की कोशिश में जुट जाती है। बड़वानी में ही ऐसा ही हुआ पर यहां जिस चिकित्सक को निशाना बनाया गया है वह चुप नहीं बैठे, डॉ.आरएस पलोद ने विभाग की कलई खोल दी उन्होंने कलेक्टर और विभाग के आलाअधिकारियों को बड़वानी जिला चिकित्सालय की ओटी के बारे में जो भी पत्र व्यवहार किया गया था, कि ओटी जो कि साठ साल पुरानी है और इसमें इंफेक्शन फैला हुआ है। उन्होंने कलेक्टर अजय गंगवार को लिखे पत्र का खुलासा किया, डॉ.पलोद ने कलेक्टर से ओटी के सुधार के लिए कहा था लेकिन उन्होंने इसे गंभीरता से न लेकर जनभागीदारी समिति से उक्त कार्य के लिए पैसा दिलाने की बात की थी अब जबकि इस संक्रमित ओटी में आपरेशन करने से 46 लोगों की आंखों की रोशनी चली गई तो कलेक्टर ने संक्रमण की जानकारी न होने का बयान देकर, अपना बचाव कर लिया। डॉ.पलोद के खुलासे के बाद सरकार फंसती दिखाई दी तो उसने पूरे प्रदेश के चिकित्सालयों की ओटी के जांच करने के निर्देश जारी कर दिए हैं, एम्स की टीम को भी बुला लिया गया है। ऐसा नहीं है कि सरकार को जिला चिकित्सालयों के हालातों के बारे में मालूम नहीं है, चिकित्सालयों की ओटी में संक्रमण की जानकारी चिकित्सकों द्वारा कई बार दी जा चुकी है, चिकित्सीय औजारों और चिकित्सीय मशीनों को लेकर भी कई बार लिखा जा चुका है लेकिन सरकार का ध्यान इस ओर कभी नहीं गया। प्रदेश में सरकारी चिकित्सालयों के क्या हालात हैं सरकार के पास इसकी जानकारी है लेकिन वह इनमें सुधार के लिए इच्छुक कभी नहीं रही, जनभागीदारी समिमियों पर इस दायित्व को निभाने का दबाव डाला जाता रहा है। बजट के अभाव का बहाना सरकार की आदत बन चुका है यही वजह है कि सरकार की चिकित्सा योजनाएं भी दम तोड़ चुकी हैं। सरकार को कहीं तो ईमानदारी का परिचय देना होगा उसे सच को स्वीकारना होगा कि वह प्रदेश के लोगों के स्वास्थ के साथ न्याय नहीं कर पा रही है।

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