February 19, 2018
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साहित्य

दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था

verna gulshan me koi bhee

अब खुला झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ अब जो मंज़र है वो पहले तो नज़र आया न था

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दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था

इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था

 

सुर्ख़ आहन पर टपकती बूँद है अब हर ख़ुशी

ज़िंदगी ने यूँ तो पहले हम को तरसाया न था

 

क्या मिला आख़िर तुझे सायों के पीछे भाग कर

ऐ दिल-ए-नादाँ तुझे क्या हम ने समझाया न था

 

उफ़ ये सन्नाटा कि आहट तक न हो जिस में मुख़िल

ज़िंदगी में इस क़दर हम ने सुकूँ पाया न था

 

ख़ूब रोए छुप के घर की चार-दीवारी में हम

हाल-ए-दिल कहने के क़ाबिल कोई हम-साया न था

 

हो गए क़ल्लाश जब से आस की दौलत लुटी

पास अपने और तो कोई भी सरमाया न था

 

वो पयम्बर हो कि आशिक़ क़त्ल-गाह-ए-शौक़ में

ताज काँटों का किसे दुनिया ने पहनाया न था

 

अब खुला झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ

अब जो मंज़र है वो पहले तो नज़र आया न था

 

सिर्फ़ ख़ुश्बू की कमी थी ग़ौर के क़ाबिल 'क़तील'

वर्ना गुलशन में कोई भी फूल मुरझाया न था

                                      क़तील शिफ़ाई

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